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देश के इतिहास में विगत 05 अगस्त 2019 की तिथि स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो गयी। सालों से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे वैश्विक संघ में चन्द देशों के वीटो पॉवर का दंश झेल रहा देश यथार्थतः आन्तरिक तौर पर भी हितों की असमानता से संघर्ष कर रहा था। प्राकृतिक दृष्टि से देश का स्वर्ग कहे जाने वाले जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन का बेजोड़ मसौदा तैयार कर सरकार ने स्थानीय आवाम के साथ-साथ पूरे देश को खुलकर जीने का मौका दे दिया। इससे न केवल भौगोलिक बदलाव हुए बल्कि सार्वभौमिक तौर पर यह एक क्रान्तिकारी घटना के रूप में इतिहास में दर्ज हो गया। एकल नागरिकता, एक ही पताका, राज्य व केन्द्र शासित प्रदेशों के लोक हितैषी विभाजन समेत अन्य निर्णयों से निश्चय ही देश को वो मान मिला जिसका वो वर्षों से हक़दार था।

       भारतीय संविधान में देश को सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न, लोकतंत्रात्मक, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी गणराज्य की संज्ञा दी गयी है किन्तु माँ भारती का महिमामण्डन करती ये पंक्तियाँ वास्तव में अब जाकर सार्थक सिद्ध हुयी हैं। आतंक के खिलाफ पहले भी सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक समेत अनेक सराहनीय कदम उठाये हैं पर यह निर्णय बिना किसी हथियार के एक घातक प्रहार के समान है जो निश्चय ही पाकिस्तान के नापाक इरादों पर नकेल कसने में सफल साबित होगा।

           इतिहास के पन्ने पलट कर देखा जाये तो भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी खासियत रही है कि जब-जब राष्ट्रहित की बात आती है तो विभिन्न दलों के प्रतिनिधि वैयक्तिक हितों का परित्याग कर एक ही मंच पर आ खड़े होते हैं। कश्मीर को लेकर हुए  इस बड़े फैसले के नए राजनीतिक मायने भी खुलकर सामने आये, बसपा और आप जैसे राष्ट्रीय दलों ने भी इस फैसले की सराहना की और सरकार के साथ खड़े नज़र आये। देश की आवाम को भी इस बात पर फक्र होगा कि उनके मत ने समानता के उस मौलिक अधिकार पर जमे उस धूल को साफ कर दिया जो सालों से जमे हुए थे और किसी ने इसके नैतिक सफाई की जहमत नहीं उठाई थी। वर्तमान भारतीय राजनीति भी संक्रमणकाल से गुजर रही है, आवाम भी आशा व आशंका के मिश्रित मनोभावों से नवीन भारत में अपना भविष्य तलाश रही है। नवीन सरकार के स्थापना के चन्द महीनों बाद ही यह ऐतिहासिक फैसला निश्चित रूप से सुकून देने वाला है।

           सरकार के इस फैसले से निश्चित तौर पर पाकिस्तान और उसकी कुख्यात ख़ुफ़िया संगठनों के खतरनाक मंसूबों को तगड़ा झटका लगा है और वो पलटवार के लिए तैयार होंगे। अंग्रेजी में एक कहावत है "Prevention is better than Cure" अर्थात् सुरक्षा से सतर्कता बेहतर होती है, इस बात को नज़रअंदाज़ न करते हुए सरकार को आतंरिक तौर प्रत्येक भावी सामरिक परिस्थितियों की लिए भी तैयार रहना चाहिए। राष्ट्रीय स्वाभिमान का स्तर इतना उच्च हो कि देश का प्रत्येक व्यक्ति आन-बान-शान से सिर उठाकर कह सके "सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं मिटने दूंगा, मैं देश नहीं मिटने दूंगा, मैं देश नहीं झुकने दूंगा।"   

                                                                           - अंकित भोई 'अद्वितीय' महासमुन्द (छत्तीसगढ़)