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मैं मांस खाता हुं, मैं मांसहारी हूँ , मैं नहीं मानता कि मांस खाना कोई बुरी बात है ।जो लोग जीव हत्या के तर्क देते हैंं , मॆं उनसे कतई सहमत नहीं।

ईद के दिन अगर गोश्त का रिवाज चले, तो उसमें भी कोई हरज नहीं। जो लोग किसी बहाने किसी के गोश्त खाने का विरोध करें, मुझे स्वीकार नहीं ।
लेकिन अगर कोई ईद के दिन कुरबानी के नाम पर इसलिए गोश्त खाए या कुरबानी करें कि वो कोई पुण्य कमा रहा हॆ, मेरे हिसाब से बेवकूफी होगी।
किसी के कुछ खाने या गोश्त खाने या न खानें से खुदा खुश होगा, यह मात्र भ्रम हॆ ।
इसलिए ईद के दिन आपकाअधिकार हॆ कि आप गोश्त खाए या न खाए ,लेकिन आप यह सोच कर किसी जानवर को काटे जा रहे हो कि इससे आपका रब राजी हो रहा हॆ, यह एक बेवकूफी होगी।
लोगों का एक वर्ग बड़े गॆर जिम्मेदाराना अन्दाज से जीव हत्या मे आरोप मुस्लमानो पर लगा रहा हॆ, लेकिन उनको यह स्वीकार करने मे तकलीफ होती हॆ कि जीव हत्या का यह काम आपके समाज या अन्य धर्मों में  कहाँ कम हॆ।असल में इन लोगों को जीव हत्या से मतलब नहीं बल्कि इनको मतलब माहोल को खराब करने से होता हॆ ।
क्या आप यह नहीं जानते कि भारत मे कुल 80% लोग मांसहारी हॆं, जिसमें 25% तो बेचारे मुसलमान जीव हत्यारे हुए, बाकि 75% को मांस शायद पेड़ो पर मिलता हॆ???

पिछले कुछ वर्षों में जैसे जैसे ईद उल अजहा नजदीक आने लगती है तो यह मुद्दा बड़े जोरशोर से उठने लगता हैं।  लोगों के मन में जीव प्रेम जागने लगता है । आश्चर्य तो तब होता है जब वो लोग जीव प्रेम की पेरवी करते दिखते हैं जिनके घर सप्ताह में दो तीन बार मांस जरूर पकता है । इन भाइयों के अपने तर्क भी जोरदार होते हैं । मुझे एक सजन मिले ,उनके भी अपने तर्क थे। उन्होंने ने मुझे बड़ी उत्सुकता से पूछा - क्यों जी खान सा ईद कब है ? मैंने कहा - जी दस दिन बाद है। बस फिर भाई साहब शुरू हो गए , उन की एक एक बात में जीवों के प्रति दया भरी थी , उन्होंने ने जीव हत्या के सैकड़ों पाप गिना लिए ,दो चार श्लोक भी ठोक दिए , और साथ साथ मुझ से यह अपेक्षा भी कर बैठे कि इस ईद पर तचम हरगिज ऐसा ना करना।मैने भी हां हां कर दिया।

मैने बात को कुछ घुमाया ,कुछ ईधर ऊधर की हांकी । फिर मैने भी एक सुझाव उछाला ,क्यों ना एक दिन मिल बैठ के खा पी लें ? भाई साहब को सुझाव अच्छा लगा , धीरे से हां कह दी ,मैने आगे कहा - खर्चा वर्चा मैं कर लूंगा ।  बस आप तो मीनूं और दिन की बात करें ।भाई साहब तपाक से बोले - बस मंगलवार  ना ।

मैने कहा - मंगलवार नहीं ? वो क्यों ?

भाई साहब बोले - यार वो क्या है ना ,मंगलवार को हमारे नांनवैज नहीं चलता ।

बस आगे कुछ कहने की जरूरत नहीं है। आप खुद (पाठकगण) समझदार हो , जो बंदा मुझे जीव प्रेम का उपदेश दे रहा था , उसको मंगलवार के अलावा  मीनूं में नांनवैज चाहिए।

मुद्दा अगर जीव प्रेम का हो तो मैं सहमत हूँ लेकिन मुद्दा जब ईद केदिनही जीव प्रेम का हो तो फिर बात अलग है।

आखिर लोगों को हर रोज की जीव हत्या नज़र क्यों नहीं आती ? सिर्फ़ ईद के दिन ही सब का जीव प्रेम क्यों जाग जाता हैं।

क्या यह समझ नहीं आता की जितनी भी मवैसी बिकती है वो सीधे बूचडख़ाने जाती हैं , क्या यह समझ में नहीं आता कि जो दुकानों में मीट बिक रहा है वो गोबी टमाटर की तरह बगीचे से सीधा सप्लाई नहीं होता है , इन सबके पीछे जीव हत्या है ,ये क्यों नहीं समझ मेंं आता ?

समझ हरेक की अपनी अपनी होती हैं लेकिन में सभी से निवेदन करुंगा कि शाकाहार बेशक बैहतर है ,उसको बढाया जाना चाहिए , लेकिन मानव सभ्यता की कहानी से साबित है कि मनुष्य के लिए मांसाहारी होना कहीं कोई अनुचित या अमानवीय नहीं है।

एक व्यक्ति अपने आपको पूर्ण शाकाहारी बनाए रखे ,यह अच्छी बात है , लेकिन किसी का पूर्ण शाकाहारी न रह पाना कोई बुराई नहीं है। लेकिन फिर भी मैं मानता हूँ कि जो लोग पूर्ण शाकाहारी है , वे  एक दर्जा मांसाहारियों से उत्तम है।

लेकिन मुद्दा यह नहीं है ,मुद्दा यह है कि जिनके घर सिर्फ मंगलवार को ही मांसाहार पर पाबंदी है ,उनको ईद के दिन मुसलमानों के मांसाहार से तकलीफ है। तब यह कहना पड़ता है कि मुसलमानों को भी मांस खाने का अधिकार है । कम से कम उन बंधुओं से निवेदन रहेगा कि जो खुद मांस खाते हैं ,चाहे किसी भी धर्म या क्षैत्र के हो ,उन्हें ईद की कुर्बानी के खिलाफ प्रोपेगैंडा नहीं करना चाहिए.,  


रहीम नादान