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'नॉट इक्वल टू लव’ में  आभासी 

 दुनियां एवं आज का यथार्थ
आभासी दुनिया और आज का हमारा जीवन अगर ध्यान से देखा जाए तो हम पाते हैं, कि  ये दोनों अलग-अलग जीवन हैं  जो हम व्यतीत करते हैं। जिसमें एक हमारी वास्तविक दुनिया हैं जहाँ हम भौतिक रूप से निवास करते हैं। चीजों को छूकर अनुभव कर सकते हैं। खाते -पीते हैं, खुशी हो या गम हो सीधा-सीधा अनुभव करते हैं। यह हमारी वास्तविक दुनिया है। आभासी दुनिया का मतलब वह जिंदगी है, जिसे हम वास्तविक रुप से नहीं जीते हैं,जिसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं होता । इंटरनेट आज हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बहुत से लोग आज इंटरनेट एवं सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर प्रतिदिन 10 से 15 घंटे बिताने लगे हैं। वह वास्तविक दुनिया से नाता तोड़कर आभासी दुनिया को ही अपनी दुनिया समझने की भूल कर रहे हैं। यह वर्चुअल वर्ल्ड है आभासी दुनिया।
इसी हकीकत को लेखक सूरज प्रकाश ने अपने उपन्यास ‘नॉट इक्वल टू लव’ में दर्शाने का प्रयास किया है। यह उपन्यास एक नई शैली संवाद शैली (चैट) पर आधारित है। जो सोशल मीडिया के सशक्त साधन फेसबुक पर आधारित है।
लेखक सूरज प्रकाश ने इस आधुनिक युग को अपनी लेखनी में ढालने का प्रयास किया है और सोशल मीडिया का हमारे जीवन में क्या महत्व है यह बताने का प्रयत्न किया है। आजकल चारों ओर हम इसके दुष्परिणाम ही सुनते हैं लेकिन लेखक सूरज प्रकाश ने जिन पहलुओं को हमारे सामने रखा है उससे सोशल मीडिया और आज के जीवन का संबंध स्पष्ट नजर आता है। इंटरनेट पर आधारित सोशल नेटवर्किंग बेशक आभासी है लेकिन आज के जीवन में वरदान भी साबित हो रही है। जो मानवता भौतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दुनिया के कारण असंख्य भागों में बँटी हुई थी, सोशल नेटवर्किंग ने आज सभी बाधाओं को हटाकर पूरी मानवता को एक सूत्र में बांधने का काम किया है,जिसके कारण से मानवीय संपर्क और संबंधों की सीमाएं अनंत हो गई हैं लेकिन महानगरीय अवसाद  और अकेलेपन के बीच अनेक बार सामाजिक होने का भ्रम  पैदा करती इन साइट्स कि लत खेल बिगाड़ देती है। आज संचार बेहद सस्ता और लोकतांत्रिक बन चुका है और इसका मज़ा सिर्फ नौजवान ही  नहीं, अधेड़ और बुजुर्ग और स्त्रियाँ भी उठा रहे हैं।
आज का युग सूचना प्रौद्योगिकी का युग है। कंप्यूटर के विकास में तो मानो क्रांति ही ला दी है।आज घर बैठे-बैठे ही हम सभी तरह की जानकारियाँ पा सकते हैं। ‘नॉट इक्वल टू लव’ उपन्यास में लेखक ने का हमारे जीवन में सूचना क्रांति के महत्व को दर्शाया है कि यह कैसे हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा किस-किस रूप में है। नायिका छवि संयुक्त परिवार की जिम्मेदारी निभाते हुए जीवन जी रही थी लेकिन इसी सूचना क्रांति ने उसके जीवन में कुछ पल खुशी के, आशा और विश्वास के भर दिए। जब घर बैठे रसोई में काम करते हुए यू ट्यूब पर संगीत का आनंद लेती है, घर बैठे साहित्य पढ़ती है। मानो उसके संसार में पंख लगा दिए किसी ने। फेसबुक के माध्यम से उसे अच्छा दोस्त देव तो मिला ही, साथ में उसके जीवन को नई ऊँचाइयाँ मिली। देखिए जब देव से साहित्य पढ़ने की माँग करती है-
“-आप मुझे कुछ अच्छा पढ़ने को भेज सकते हैं?
-अपना सही ईमेल आईडी दें।
-कुछ ईबुक्स भेज रहा हूँ।” 1.
‘ईबुक्स’ यानी घर बैठे किताबें अपने कम्प्यूटर पर पढ़े। ये किसी क्रांति से कम नहीं किसी औरत के लिए। आज साहित्य पढ़ने के लिए कितनी ही साइट्स है। जीवन में जब काम से बेचैन हो तो ध्यान का मंत्र भी हमें घर बैठे ही उपलब्ध हो जाए ये वास्तव में चमत्कार ही लगता है। लेकिन ये आज संभव हुआ इसी सूचना क्रांति से। सूचना क्रांति के कितने रूप हैं ये गिनना शायद मुमकिन ना होगा। किस-किस रूप में हम इससे बंधे हुए हैं जैसे- ईमेल, जीमेल, जीटाक, सूचनाएँ भेजने का साधन है। चाहे संगीत हो, हर समय काम करते-करते किसी भी तरह का संगीत हम सुन सकते हैं। जीवन को कितना आसान और सुखमय बना देती है सूचना क्रांति। जहाँ औरतों को आज़ादी नहीं है घर से बाहर जाने की वहाँ सूचना क्रांति ने उनके जीवन में पारस पत्थर का काम किया है।नायिका छवि शादी के पहले केवल बी.ए. पास थी लेकिन उसने धीरे-धीरे इंटरनेट से ही किताबें पढ़ते हुए दूर शिक्षण की सहायता से चार विषयों में एम. ए. कर लिया। नेट एग्जाम की तैयारी करती है। यह कहीं ना कहीं इंटरनेट का ही कमाल है जो महिलाओं को सशक्त बना रहा है घर बैठे उनके लिए रोजगार के साधन विकसित कर रहा है।
यह अभिव्यक्ति का ऐसा प्लेटफार्म है जहाँ अभिव्यक्ति मायने रखती है भाषा नहीं। किसी खास व्याकरण या उच्चारण की जरूरत नहीं। आप अपने मन मुताबिक अपनी भाषा में बातचीत के लिए स्वतंत्र होते हैं। जब भाषा की कोई मजबूरी नहीं होती तो हम खुलकर अपनी ही भाषा, में अभिव्यक्ति करते हैं। यही सच्चाई है हम उसी भाषा में अभिव्यक्त करना पसंद करते हैं जिस भाषा में हम पारंगत होते हैं।
सोशल नेटवर्किंग केवल बड़े लोगों के विचारों की ही अभिव्यक्त का साधन नहीं है बल्कि देश की उन औरतों के लिए भी सुनहरा अवसर है जिन्हें घर से बाहर जाने का ना समय है ना आजादी। नायिका छवि एक जगह बताती है -“क्या मेरे लिए यह सुख की बात नहीं मैं फेसबुक के जरिए आप जैसे कुछ अच्छे लोगों से बात कर लेती हूँ वो भी तब जब मैं घर के बाहर कदम भी नहीं रख पाती। सब कुछ चारदीवारी के भीतर। और कई बार तो रसोई के भीतर जैसे अभी हूँ।” 2. देश में ना जाने कितने औरतें घरों में ऐसे रहती हैं। बिना अभिव्यक्ति के जहाँ उन्हें ना कोई सुनने के लिए है ना ही समझने के लिए है। ऊपर से ना कोई उऩके कामों की प्रशंसा करता है। ना किसी के पास दो शब्द आभार के हैं।
छवि बताती है छोटे शहरों में औरतों को एक पुरुष दोस्त बनाने की भी आजादी नहीं है। यहाँ कम से कम दोस्त तो मिलते हैं। छवि बताती है - “अपने शहर और यहाँ के माहौल की सारी बातें तो आपको बता चुकी। सच तो ये है कि हम यहाँ पर्सनल फ्रेंड रखना एफोर्ड ही नहीं कर सकते। पति या भाई के अलावा बाहर निकले नहीं....सबको लिटरली जवाब देना पड़ता है कि कौन है। वी जस्ट कैन नॉट एफोर्ड टू हैव ए मेल फ्रेंड। बात खत्म हो जाती है।” 3. सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर हमें दोस्त बनाने की, खुद को अभिव्यक्त करने की आजादी मिलती है।
सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर आप अपनी सुरक्षा के लिए पहचान छिपाए रख सकते हैं। हमारे पास पूरी आजादी होती है मन चाहे व्यक्ति से संवाद करने की व पसंद ना आने पर आप वार्तालाप बंद कर सकते हैं। जीवन में हमें यह स्वतंत्रता नहीं मिलती, दोस्तों, रिश्तेदारों को एक झटके में बातचीत बंद कर दें। जो पसंद ना आए संवाद बंद और उसे रोक सकते हैं। एक जगह पर देव भी छवि से कहता है कि-“फेसबुक में हमारे पास रिमोट होता है। ये जो चैनल बदलने की आदत होती है न, जीवन के हर काम में हम इस्तेमाल करते हैं। जो पसंद नहीं, अच्छा नहीं, उसे सामने से हटा दो। हम जीवन भर यही करते रहते हैं।” 4. यही आजादी हमें सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर खींचती है। होता भी वहीं है जो वास्तविक दुनिया में नहीं मिलता वो हम आभासी दुनियां में पाते हैं सबसे बड़ी खुशी अभिव्यक्ति की मिलती है। फेसबुक  के बारे में देव लिखता है जो बहुत सटीक है -“हमारे देश में बहुत सी असंतुष्ट और अतृप्त आत्माएं रहती हैं। फेसबुक ऐसी असंतुष्ट और अतृप्त आत्माओं की भावात्मक शरणस्थली है। ऐसी ज्यादातर आत्माएं यहाँ एक मजबूत कंधा तलाश रही है ताकि अपना सिर कुछ देर के लिए टिका सके लेकिन डरती भी है कि कंधा देने वाला कहीं पीठ पर हाथ न फेरने लग जाए।” 5. जो यह सिद्ध करता है कि सुरक्षा एवं सही व्यक्ति का चुनाव कितना जरूरी है और साथ ही अपनी निजता को बनाए रखना अतिआवश्यक है।
सोशल नेटवर्किंग साइट्स जैसे फेसबुक की जब बात करते हैं तो उसके फायदों के साथ नुकसान या नकारात्मक प्रभावों को भी सोचते हैं। इस बारे में लेखक अपने विचार छवि के माध्यम से व्यक्त करते हैं कि- “आज हम कह सकते हैं कि फेसबुक उनका या सबका समय ले रहा है। फेसबुक परिवार का ताना-बाना बिगाड़ रहा है या गंदगी फैला रहा है या ये कर रहा है वो कर रहा है। तो सर, कोई नई चीज आती है तो उसके फायदे नुकसान समझने में समय तो लगता ही है। फेसबुक हमारे जीवन में अचानक आया और आते ही हमारे जीवन में इतनी जगह घेर चुका है कि जब तक इस से बेहतर विकल्प नहीं आ जाता है यही रहने वाला है। मैं स्वीकार करता हूँ कि लड़कियां या महिलाएँ इसका कहीं ना कहीं गलत इस्तेमाल भी कर रही होंगी, तो क्या पुरुष वर्ग इसका गलत इस्तेमाल नहीं कर रहा है। अगर फेसबुक या मोबाइल के इस तरफ लड़की है तो तय है दूसरी तरफ पुरुष है। तो सौदा बराबर का हुआ ना।” 6. नायिका का कहना बिल्कुल सही है। गलत इस्तेमाल अगर महिलाएँ कर रही है तो पुरुष भी कर रहे हैं। अपनी सुरक्षा तो सब को बनाकर चलनी पड़ती है। सिर्फ प्रौद्योगिकी को बुरा कहना ठीक नहीं होगा।
आखिर में अपनी समझ व विवेक ही हमारे जीवन में सुरक्षा व शांति बनाए रखता है। हर चीज या प्रौद्योगिकी को इस्तेमाल हमें सुरक्षा बनाए रखते हुए, तालमेल बनाकर ही करना चाहिए। चाहे फेसबुक हो या कोई भी सोशल नेटवर्किंग सही तालमेल ही हमें सही इस्तेमाल करवाता है। जरा-सी चूक जीवन में कठिनाई भी पैदा कर सकती है।
लेखक ने हमारा ध्यान दोनों ही पक्षों पर लाने का प्रयास किया है। एक तरफ नेटवर्किंग के सुखद परिणाम व दूसरी तरफ इसकी खामियां भी हैं। यह भी एक सच्चाई है कि ऐसे लोग आपको यहाँ मिल जाते हैं जो समाज में गंदगी फैलाने का काम करते हैं, जिससे बच्चों पर बुरा प्रभाव विशेष रूप से पड़ता है। ऐसे लोग अभिव्यक्ति का गलत प्रयोग करते हैं और अनाप-शनाप बुरी चीजें ऑनलाइन डालते रहते हैं। आज करोड़ों लोग सोशल साइट्स पर संवाद करते हैं और अपने मन के दबे-छिपे भाव व्यक्त करते हैं। अपनी खुशियाँ, दुख, कुंठाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, अपेक्षाएँ सब सांझा करते हैं।
सोशल साइट्स समय के साथ-साथ आपकी एकाग्रता को भी भंग करती है और आपके दैनिक जीवन के समय में से बहुत-सा समय तो बस सोशल साइट्स पर लाइक देखने में ही चला जाता है। एक जगह देव भी फेसबुक से जाने की बात करता है- “विदा मित्रों फेसबुक से मैं विदा ले रहा हूँ। फेसबुक ने बहुत कुछ दिया। ढेर सारे अनुभव, आप जैसे दोस्त और दुनिया को देखने का एक नया नजरिया लेकिन फेसबुक के चक्कर में लिखना-पढ़ना छूटता जा रहा है। अब सारा समय लिखने में लगाऊँगा।” 7. आजकल इन साइट्स के मोह से कोई भी नहीं बच पा रहा है। हर इंसान इस दोहरी जिंदगी को जी रहा है। लेखक देव भी यह बात महसूस करता है कि फेसबुक की गतिविधियाँ उसके लेखन को बाधित कर रही हैं।लोग परिवार व अपनों को छोड़कर कहीं और ही कंधा तलाश कर रहे होते हैं। रिश्तों में इतना अलगाव होता जा रहा है कि जिस परिवार के लिए पहले इतने प्यार से खाना बनाते थे अब बोझ लगता है। छवि जब अपने परिवार के बारे में देव से बताती है तो देव कह उठता है कि-“-ग्रेट! लेकिन फेसबुक पर एक अजनबी के साथ पहली ही चैट में अपने परिवार वालों के प्रति इतना गुस्सा। हमें ही हजम नहीं हो रहा है।” 8. ये छोटा सा वाक्य बहुत बड़ी बात कह रहा है अपने आपमें, कि हम कैसे इतने आराम से अपने परिवार की सारी बातें अजनबी लोगों से कह पाते हैं। हम कैसे इतना सहज हो पाते हैं
निष्कर्ष:
आधुनिक युग में इंटरनेट एवं सोशल नेटवर्किंग हमारे जीवन का अहम हिस्सा है। हम लगभग 5-10 घंटे प्रतिदिन इंटरनेट पर बिताते हैं। हमारे जीवन से जुड़ी हर छोटी-बड़ी ज़रूरतें इससे जुड़ हुई हैं। चाहे शिक्षा, व्यापार, खरीददारी, मित्र बनाना ,सूचनाएँ प्राप्त करना, देश-दुनिया की गतिविधियों से जुड़ना आदि सब कुछ इंटरनेट से ही जुड़ गया है।घर बैठे औरतों को सशक्त बनारहा है, अपने अधिकारों के प्रति सजग कर रहा है
जहाँ आभासी दुनिया के रिश्तों से जुड़े हैं वहीं अपने वास्तविक रिश्तों में अलगाव आ गया है। हम परिवार में सबके साथ होते हुए भी अकेले व निराश महसूस करते हैं। रिश्तों में दूरियाँ आ गई हैं। कहीं -कहीं पर रिश्तों में दूरियां आ जाने के कारण भी लोग इस और आकर्षित हो रहे हैं ।जहाँ एक और आभासी दुनिया में हमें अच्छे दोस्त मिलते हैं, जिनसे हम सहज ही भावात्मक जुड़ाव महसूस करते हैं। वहीं दूसरी तरफ इसका दूसरा घिनौना चेहरा भी है जहाँ हमारी निजी जानकारियों का लाभ उठाकर कुछ लोग अप्रिय घटनाओं को अंजाम देते हैं। शोषण, बलात्कार, बच्चों का अपहरण आदि घटनाएँ होती है। आभासी दुनिया केवल आभास ही करवाती है बेशक उसके पीछे के चेहरे असली है ,लेकिन वे हमारे वास्तविक रिश्तों की जगह नहीं ले सकते। ये सच है कि जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे आज हम आभासी दुनिया का उतना ही हिस्सा है जितना वास्तविक जीवन का। हमें अपने जीवन और आभासी जीवन के बीच सही तालमेल बनाना जरूरी है। किसी भी चीज की अति हानिकारक होती है। जो भावात्मक रिश्ते हम आभासी दुनिया में ढूंढते हैं वो हम अपनी वास्तविक दुनिया में क्यों ना ढूंढ़े। कहीं ना कहीं हमारी कुंठा, निराशा, अकेलापन आभासी दुनिया का भी परिणाम है।
ग्रंथ-सूची:
1..सूरज प्रकाश, ‘नॉट इक्वल टू लव’, पृ.सं.-46
2.सूरज प्रकाश, ‘नॉट इक्वल टू लव’, पृ.सं.-56
3. सूरज प्रकाश, ‘नॉट इक्वल टू लव’, पृ.सं.-141
4. सूरज प्रकाश, ‘नॉट इक्वल टू लव’, पृ.सं.-89
5. सूरज प्रकाश, ‘नॉट इक्वल टू लव’, पृ.सं.-69
6.सूरज प्रकाश, ‘नॉट इक्वल टू लव’, पृ.सं.-66
7. सूरज प्रकाश, ‘नॉट इक्वल टू लव’, पृ.सं.-71
8.सूरज प्रकाश, ‘नॉट इक्वल टू लव’, पृ.सं.-14
     
                इन्दु नारा
   ( पी.एच्.डी. शोधार्थी)
  दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, चेन्नई