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नमस्कार ।।।

सामाजिक परिवर्तन में युवाओं की भूमिका जानने से पूर्व सबसे पहले यह सवाल उठता है कि युवा कौन है ?

कौन है युवा? –

युवा का मतलब है नये विचार, ऊर्जा, शक्ति तथा साहस है, युवाओं में बडे से बडे अन्याय को चुनौती देने का साहस तथा समाज व राष्ट्र में परिवर्तन लाने की शक्ति भी है। युवा किसी भी देश व समाज की रीढ़ की होता है एक तरफ युवा देश का वर्तमान तो दूसरी तरफ भूत व भविष्यकाल के सेतु भी है युवाओ का योगदान समाज को बेहतर बनाने और राष्ट्र के निर्माण में सर्वाधिक होता है जिसका उदाहरण हम देश के स्वतंत्रता आंदोलन में भगत सिंह, चंद्र शेखर आजाद,रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, करतार सिंह सरोपा, वीर सावरकर आदि अन्य युवाओ के तौर पर देख चुके है ये वो युवा थे जिनके  जीवन का एकमात्र उद्देश्य था राष्ट्र प्रेम व अपने समाज के लिए कुछ कर गुजरना इन युवाओं के हृदय में राष्ट्र प्रेम का जज्बा कूट-कूट कर भरा था कोई जाति, धर्म, संप्रदाय, भाषा व क्षेत्र के विचार इन्हें छू भी नहीं पाते थे। एक कहावत है ‘’युवा जिधर मुड़ता है उधर इतिहास मुड़ जाता है’’ स्वामी विवेकानन्द युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं उन्होने भारतीय संस्कृति व सभ्यता के बारे में पूरी दुनिया को बताया ।

वर्तमान में युवा-

भारत बड़ी जनसंख्या वाला देश है यहां आधी जनसंख्या युवाओं की है, देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या की आयु 35 वर्ष से कम है संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है यहां के लगभग 60 करोड़ लोग 25 से 30 वर्ष के हैं यह स्थिति वर्ष 2045 तक बनी रहेगी लेकिन आज के दौर में देखा जाए तो कि युवाओं नकारात्मकता जन्म ले रही है उनमें धैर्य की कमी है वे हर वस्तु अति शीघ्र प्राप्त कर लेना चाहते हैं वे आगे बढ़ने के लिए कठिन परिश्रम की बजाय शॊर्टकट्स खोजते हैं भोग विलास और आधुनिकता की चकाचौंध उन्हें प्रभावित करती है उच्च पद, धन-दौलत और ऐश्वर्य का जीवन उनका आदर्श बन गए हैं अपने इस लक्ष्य को प्राप्त करने में जब वे असफल हो जाते हैं  तो उनमें चिड़चिड़ापन आ जाता है कई बार वे मानसिक तनाव का भी शिकार हो जाते हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट्स युवाओं की जिंदगी का एक अहम अंग बन गया है युवाओं को बड़ी ही सक्रियता से जोड़ने का काम सोशल मीडिया कर रहा है। युवा वर्ग में सोशल नेटवर्किंग साइट्स का क्रेज दिन-पर-दिन बढ़ता जा रहा है। युवाओं के उसी क्रेज़ के कारण आज सोशल नेटवर्किंग दुनिया भर में इंटरनेट पर होने वाली नंबर वन गतिविधि बन गया है। निर्यातक कंपनी टी.सी.एस. की ओर से कराये गये सर्वे में युवाओं की सोशल साइट्स के बारे में प्रतिक्रिया जानने के बाद बताया गया कि फेसबुक को सबसे ज्यादा किशोर पसंद करते हैं यह अच्छा है कि युवा सोशल मीडिया में सक्रिय है लेकिन देखा जाए आज का युवा भले ही फेसबुक,इंस्टाग्राम में आगे हो लेकिन देश के समाज के हित के लिए नही ... यह एक कटु सत्य है कि आज के युवाओ की देशभक्ति सोशल मीडिया पर ही नजर आती है वो भी केवल कुछ तिथियो में ...

आज का युवा स्वार्थी हो गया है , वो देश की तरक्की के बारे में न सोच कर केवल और केवल अपने बारे में सोचता है ।

           

आखिर कैसे आयेगा युवाओ में परिवर्तन –

विकासशील से विकसित देश बनाने के लिए देश के युवाओ को सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक व प्रशासनिक सभी विषयों में भाग लेना होगा स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि ‘’ युवा देश की वास्तविक शक्ति है’’ जो कि सत्य है अब युवाओ को समाज के प्रति, देश के प्रति जिम्मेदारीया लेनी होंगी जिससे देश विकसित हो सके ।

युवाओ की जिम्मेदारी – मुख्य तौर पर युवाओ की 2-3 मुख्य जिम्मेदारी होती है जो कि निम्न है -

1)   देश के प्रति जिम्मेदारी – अगर बात देश के, समाज के बद्लाव में युवाओ की है तो इन बदलाव के लिए देश के युवा को देश से प्रेम रखना होगा जिसके चलते ही वह देश की , समाज की तरक्की के बारे में सोच पाएगा, सबसे पहले देश के युवाओ को देश का एक अच्छा नागरिक बनना चाहिए उसके बाद इमांदारी से देश के प्रति जिम्मेदारी जैसे – सही मतदान करना, देश को स्वच्छ रखना, रिश्वत न देना न लेना आदि समझना चाहिए और आस-पास के लोगो को भी इन जिम्मेदारीयो को समझने के लिए प्रेरित करे ,एक अच्छा नागरिक वही है जो खुद भी जिम्मेदार बने और साथ- साथ दुसरो को भी इसके लिए प्रेरित करे ।

2)   समाज के प्रति जिम्मेदारी- युवाओ को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए उसके लिए युवाओ को समाजिक होना पडेगा उन्हे समाज की गतिविधियो में भाग लेना होना , समाज क्या सोचेगा समाज क्या कहेगा इन बातो से ऊपर उठ कर उन्हे हर उन कार्यो को करना होगा जो समाज के लिए लाभयदायक हो और जिन कार्यो से समाज का विकास हो ।

3)   परिवार के प्रति जिम्मेदारी- यदि युवाओ की परिवार के प्रति जिम्मेदारियो की बात करे तो कहना गलत नही होगा कि आज का युवा भटक गया है वह कई बार खुद के लिए सोचते है , अपने में ही मस्त रहते है माता पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझते नही जिन्होने उन्हे समाज के सामने खडा होना सिखाया, इन सब से अधिकतर देखने में आया कि परिवार बिखर जाता है ।

जब तक युवा अपने परिवार को नही सम्भाल सकता तब तक वो किसी देश किसी समाज को नही सम्भाल सकता यदि युवा परिवार का विकास नही कर सक्ता तो वो देश का विकास भी नही कर सकता परिवार भी कही न कही समाज से जुडा है इसीलिए हम समाज में परिवर्तन की बात करते है तो हमे साथ-साथ परिवार के बारे में भी सोचना पडेगा ।

         

सामाजिक परिवर्तन-

समय के साथ हर चीज में बदलाव आता है इसीलिए परिवर्तन को प्रकृति का नियम कहते है समाज,जीव व उंनका व्यवहार, व्यक्ति की सोच उनके सिद्धांत आदि में समय समय में परिवर्तन आता है ।

क्या यही परिवर्तन विकास है या विकास की ओर जाता कदम ?

हम जब अपने आस-पास नजर डालते है तो पाते है हर पल कुछ न कुछ बदलता रहता है लेकिन यहाँ समाजिक परिवर्तन की बात है ,सदियो से ही हमारी दुसरो के बारे में सोचने व उनकी नकल करने आदत सी है एक व्यक्ति दुसरे व्यक्ति से अपने आप को अलग और बेहतर साबित करने की कोशिश हमेशा करता रहता है अर्थात विभिन्न समाज में विभिन्न प्रकार के वर्गीकरण की प्रक्रिया स्वतः उत्पन्न होती है । जब हमे किसी नई चीज की आवश्यकता होती है तो हम कुछ नया अविष्कार करते है वो कह्ते है न कि आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है उसी तरह नए विकास की अवधारणा एक सामाजिक परिवर्तन की नीव बनती है ।

समाज के सामाजिक एवं सांस्कृतिक तत्व हैं, जैसे-परिवार, वर्ग, राजनीति, आर्थिक एवं सांस्कृतिक संस्थाएं ये समाज के स्थायी तत्व हैं। इनमे जो भी परिवर्तन होता है, वह इसके बाह्य स्वरूप तथा आन्तरिक अंतर्वस्तु में होता है।

समाजिक परिवर्तन के कई कारक हो सकते है , आज कल हम जगह–जगह देखते है तो पाते है कि हर जगह समाजिक आंदोलन है,समाज में परिवर्तन के लिए नई-नई क्रातियां उत्पन्न होती है। क्या होता है समाजिक आंदोलन क्या होती है क्रांति ?

समाजिक आंदोलन- 

सदियो से ही समाजिक अंदोलन समाजिक परिवर्तन का मुख्य कारक रहा है , आंदोलन से समाज में कई परिवर्तन आए है । इसमें लोग एक समान्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए समाजिक नियमो का सहारा लेकर व्य्वस्था को बदलने का प्रयास करते है ।


क्रांति- सामाजिक आन्दोलन से भी ज्यादा सामाजिक परिवर्तन का मुख्य कारक क्रांति है। क्रांति के द्वारा अनेक समाजिक परिवर्तन हुए है पिछली दो-तीन शताब्दियों में मानव इतिहास में काफी, बड़ी-बड़ी क्रांतियाँ आई हैं, जिससे कुछ राष्ट्रों में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में परिवर्तन हुए है इसमें अमेरिकी क्रांति, फ्रांसीसी क्रांति विशेष हैं। इन क्रांतियों के चलते आज समस्त विश्व में स्वतंत्रता, सामाजिक समानता और प्रजातंत्र की बात की जाती है। उसी तरह से रूसी क्रांति और चीनी क्रांति का विश्व स्तर पर अपना ही महत्व है। विश्व में अधिकांश क्रांतियाँ मौलिक सामाजिक पुनर्निमाण के लिए होती है,क्रांतियों का मुख्य उद्देश्य परम्परागत व्यवस्था से अपने-आपको अलग करना एवं नये समाज का निर्माण करना होता है।

समाजिक परिवर्तन में शिक्षा का महत्व-

शिक्षा किसी भी देश व समाज के विकास के लिए एक आवश्यक बिंदु है जो देश शिक्षा को जितना अधिक प्रोत्साहन देता है वह उतना ही विकसित देश कहलाता है, नागरिको की मानसिक व बौद्धिक विकास शिक्षा पर निर्भर करती है जिससे किसी भी देश की भावी पीढ़ी को उनके लक्ष्य के अनुसार मानसिक एवं बौद्‌धिक रूप से तैयार किया जा सके । शिक्षा लोगों को सामाजिक और पारिवारिक आदर और समाज में एक अलग पहचान बनाने में मदद करता है यह एक व्यक्ति को जीवन में एक अलग स्तर और अच्छाई की भावना को विकसित करती है। शिक्षा किसी भी बड़ी पारिवारिक, सामाजिक और यहाँ तक कि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को भी हल करने की क्षमता प्रदान करती है।

समाज की रचना इन्सान ने की है, और समाज का आधार मानव क्रिया है शिक्षा समाज से प्रभावित हेाती है वहीं समाज को परिवर्तित भी करती है । शिक्षा का प्रचार-प्रसार होगा तभी समाज का पुराना ढांचा परिवर्तित होगा । शिक्षा ने जातिगत व लैंगिक असमानता को काफी हद तक कम किया और ग्रामीण समाज अब शहरी समाजों में बदलने लगे है व विकास की ओर अग्रसर हुए । शिक्षा समाज के व्यक्तियों को इस योग्य बनाती है कि वह समाज में व्याप्त समस्याओं, कुरीतियों गलत परम्पराओं के प्रति सचेत होकर उसकी आलोचना कर सके शिक्षा समाज की संस्कृति एवं सभ्यता के हस्तांतरण का आधार बनती है। शिक्षा व्यक्ति को अपने व समाज के लिये उपयोगी बनाती है, पहले एक बच्चा परिवार का सदस्य होता है शिक्षा उसे सामाजिक कर्तव्यों एवं नागरिकता के गुणों को विकसित कर उसे समाज के भावी सदस्य के रूप में तैयार करती है।

निष्कर्ष-

हम सब जानते है कि कौन है युवा, कौन थे युवा,कौन है वर्तमान युवा,बस इस बात का अनुमान लगाना मुश्किल है आगे कौन होगा युवा ? युवा होने के लिए 18-28 साल की उम्र होना जरुरी नही जरुरी है तो बस यह कि क्या हम युवा कहलाने वाले कार्य करते है ?...

युवा शक्ति की क्रियाशीलता यदि देश के विकास,समाज के विकास में लगाया जाए तो यह शक्ति अद्भुत कार्य कर सकती है आज तक जब भी चुनौतियो का सामना करने के लिए युवाओ को पुकारा गया तो वह कभी पीछे नही ह्टे लेकिन आज युवाओ को देखे तो अधिकतर युवा स्वार्थी है उसे जहाँ अपना भला दिखेगा वो वही अपना कदम आगे करेगा और यह कटु सत्य है इसमे कोई नई बात नही कि आज अधिकतर युवा नशे के आदी है, आधे युवा पैसो के लोभ में अपने घर-परिवार व समाज में कोई रुचि नही रखते इसीलिए समाज में परिवर्तन के लिए युवाओ का उचित मार्गदर्शन होना अति आवश्यक है

राष्ट्र निर्माण का काम असान नहीं है यह अपने आप में बहुत बडा काम है इसे एक साथ और एक ही समय में पूरा नहीं किया जा सकता, युवा इस श्रेष्ठ कार्य में अपनी क्षमता और योग्यता के अनुसार भाग ले सकते हैं ऐसी असंख्य योजनाएं, परियोजनां और कार्यक्रम हैं, जिनमें युवाओं की सहभागिता सुनिश्चत की जा सकती है. युवा समाज में समाजिक, आर्थिक और नवनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. वे समाज में प्रचलित कुप्रथाओं और अंधविश्वास को समाप्त करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं. आज भी कई जगह देश में दहेज प्रथा के कारण न जाने कितनी ही महिलाओं पर अत्याचार किए जाते हैं, यहां तक कि उनकी हत्या तक कर दी जाती है. महिलाओं के प्रति यौन हिंसा से तो देश त्रस्त है. नब्बे साल की वॄद्धाओं से लेकर कुछ दिन की मासूम बच्चियों तक से दुष्कर्म कर उनकी हत्या कर दी जाती है, समाज में छुआछूत, ऊंच-नीच और जात-पात की खाई भी बहुत गहरी है । विशेषकर महिलाओं के साथ अमानवीयता व्यवहार की घटनाएं भी आए दिन देखने और सुनने को मिलती रहती हैं, जो समाज के माथे पर एक धब्बा हैं आतंकवाद के प्रति भी युवाओं में जागृति पैदा करने की आवश्यकता है ।

अधिकतर युवा स्वामी विवेकानंद जी को अपना आईड्ल मानते है केवल राष्ट्रीय युवा दिवस मनाकर व आईड्ल मानकर स्वामी विवेकानन्द जी के सपनो को साकार नहीं किया किया जा सकता, सपना पूरा करने के लिए युवाओं को अपने दायित्व का निर्वाह करना होगा !

निसंदेह, युवा देश के विकास का सबसे महत्वपूर्ण अंग है युवाओं को देश के विकास के, समाज के लिए अपना सक्रिय योगदान प्रदान करना चाहिए समाज को बेहतर बनाने और राष्ट्र निर्माण के कार्यों में युवाओं का सम्मिलित होना बहुत महत्वपूर्ण है तथा इसे जल्द ही एवं व्यापक स्तर पर किया जाना चाहिए इससे युवा एक ओर तो वे अपनी सेवाएं देश को दे पाएंगे दूसरी ओर इससे युवाओ का उत्थान भी होगा ।

‘’ यदि वर्तमान में युवा समाजिक परिवर्तन नही कर पाए तो परिवर्तन के लिए देश व समाज न जाने कौन सी अगली पीढ़ी का इंतेजार करता रहेगा’’

           

( उठोजागो और तब तक मत रुकोजब तक कि अपने लक्ष्य तक न पहुंच जाओ – स्वामी विवेकानंद)