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बातें नई  पुरानी -  भाग 2

आज पुरानी बातों में याद आई बचपन के त्योहारों की बहार ।
पहले कैसे होता था ना, हम सबसे पुराने कपड़े, छोटे हो गए कपड़े होली के लिए निकालते थे। पेंट की पुरानी बाल्टी  या टूटे डब्बे गुब्बारे रखने के लिए और रंग बनाने के लिए निकाले जाते थे।
अब जमाना बदल गया, होली के लिए खास टी शर्ट, सूट और फैशनेबल साड़ी पहनी जाती है। कभी-कभी लगता है कि किसी फिल्मी सेट पर पहुंच गए हैं ।और अब पुराने टूटे फूटे डब्बे नहीं आते, आती है सुंदर बाल्टियां ,नए डिब्बे के साथ ,जैसे हम लाते हैं नई पिचकारी हर साल।
वैसे कुछ गलत भी नहीं , क्यों हम होली को इतने हल्के में ले।
एक प्लास्टिक का मग 10 या ₹20 का आता है और उसके लिए हम कितने पुराने डिब्बे बचपन में बचाते थे आज कई सारी चीजों के लिए महसूस होता है कि बिना बात ही एफर्ट डाला एक बहुत ही छोटी सी चीज के लिए यह अलग बात है कि उस एफर्ट  में मजा बड़ा आता था। इसी सिलसिले में याद आया,
कल तक बड़े memes बनते थे मिडिल क्लास मेंटालिटी की मजाक उड़ाते हुए।
कभी टूथपेस्ट की ट्यूब से आखरी ड्रॉप तक निकालने पर, तो कभी पुराने टूथब्रश को अनेकों तरह से यूज करने पर ,तो कभी पुराने कपड़ों को नए नए तरीकों से यूज करने पर, खास तौर पर कैसे एक टी-शर्ट शरीर से उतरने पर पोछा और थोड़ा और समय गुजरने पर रफ कपड़े के तौर पर यूज़ की जाती है। यानी कि हर वह तरीका जो हमें कूड़े को मिनिमाइज करने के लिए आज pseudo modern and eco friendly लोग सिखाते हैं वही कल तक इन memes पर खूब हंसते थे।

आज जानते हैं यह परिवर्तन कैसे आया !
तब जब आज  प्रकृति ने अपना सबक दे ही दिया ।बाढ़ आई समंदर में बड़ी लहर आई और साथ लाई इंसान का छोड़ा कूड़ा, प्लास्टिक का ढेर । कोरोना आया और साथ लाया जिंदगी का सबसे बड़ा सबक कम में, खुद में कैसे गुजारा करना है।कैसे खुद ही काम करना है । कैसे छोटी-छोटी चीजें जो हम भूल चुके थे वह कितनी जरूरी है ।
इस मामले में हालांकि हिंदुस्तान और हमारा कल्चर हमेशा आगे रहा , लेकिन हम ही वेस्ट की अंधाधुंध दौड़ में अपने पुराने तौर-तरीकों को obsolete मानकर भागते रहे । नतीजा हम भी आज उसी कूड़े और प्लास्टिक प्रदूषण से जूझ रहे हैं।
याद करके बताइए कब हमारी नानी दादी प्लास्टिक की बोतलों में या प्लास्टिक के जग में पानी पीने पर हम पर नाराज नहीं हुई ?  मैंने अपने बचपन से हमेशा  कांसे के बर्तनों का प्रयोग और मिट्टी के घड़े की महक के महत्व को न सिर्फ सुना  बल्कि वाकई में जाना भी। हमारे यहां हमेशा से मेटल के बर्तनों में खाना पकाना और खाना खाना प्रेफर किया जाता था ।
पर हाय रे modernism,,
विदेश का लेबल लगाए हमारे दोस्त और रिश्तेदार, जो जब भी इंडिया आते, हम उन्हे भगवान जैसे अपना आदर्श बना लेते, उनके लाए गिफ्ट्स बड़ी शान से flaunt करते हम अपनी हर चीज़ को कमतर मानने लगे।प्लास्टिक की बोतल लेकर घूमते हमारे प्यारे एन आर आई, ऐसा हमें रंगीन चश्मा देकर गए की पुरखों का दिया एक लंबे समय चलने वाला और प्रकृति से प्रेम करना सिखाने वाला यह जो प्रैक्टिकल ज्ञान था ना, यह हमें मिडिल क्लास लगने लगा, और हम भी रेबैन के चश्मे चढ़ा के गले में SLR टांग के और हाथ में बिसलेरी की बोतल लेकर बन गए अपने ही देश में टूरिस्ट वह भी fake ।
पर चलो देर आयद दुरुस्त आयद ।कहते हैं ना जब आंख खुले तभी सवेरा। प्रकृति ने हमें उस सवेरे की पहली किरण तो दिखा दी है अब हम इस सबक को कितने समय तक याद रखेंगे देखते हैं।
मीनू
मार्च 2021