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सपना भी एक प्रकार का वह सिनेमा है जो एक व्यक्ति जब सोता है तब उसे देखता है I हकीकत में यह वही विचार हैं जो हम चेतन अवस्था में सोचते हैं और वही विचार कहीं ना कहीं हमारे दिमाग में एकत्रित हो जाते हैं ,और निद्रा में अथवा अचेतन अवस्था में वही विचार फिल्म का रूप धारण कर कहीं हमारे दिमाग में एकत्रित हो जाते हैं और निद्रा में अथवा चेतन अवस्था में वही विचार फिल्म का रूप धारण कर हमें चलचित्र के रूप में देखते हैं I यहां पर मेरा आशय उन विचारों से है जो जीवन में आने वाली चार उन अवस्थाओं के बारे में है जो बाल अवस्था ,किशोरावस्था, युवावस्था एवं प्रौढ़ावस्था है अगर देखा जाए तो यह अवस्थाएं हर किसी पर आती हैं I


इन अवस्थाओं के विचार भी भिन्न-भिन्न होते हैं I जैसा कि कहा भी गया है कि“ इमैजिनेशन एज मच मोर पावरफुल देन नालेज ”इन्हीं विचारों में हम अपने सपनों की दुनिया का निर्माण करते हैं I इसमें अंतर इतना है हर अवस्था में विचार भी अलग-अलग होते हैं जैसा कि यदि हम अध्यात्म में जाएं तो प्रकृति में 3 गुण पाए जाते हैं जो कि सतोगुण ,रजोगुण, तमोगुण हैं I यह गुण हमेशा हमारे मन पर हावी होते रहते हैं I


इसका भी अवस्था के अनुसार प्रभाव पड़ता है I बाल अवस्था में तथा किशोरावस्था में रज और तम का प्रभाव अधिक पड़ता है I जिससे विचार चंचलता पूर्वक एवं उत्तेजना पूर्वक होते हैं I इन्हीं विचारों के कारण सुनने में और कहने में तथा देखने में आता है कि इस अवस्था में अधिक लोग अपने सपनों की दुनिया साकार कर लेते हैं तथा अधिक लोग अपने सपनों की दुनिया को बर्बाद कर लेते हैं I यहां फर्क इतना ही है  जो लोग अच्छे विचारों सहित सपने देखते हैं वह अपनी अच्छी सपनों की दुनिया को बसा लेते हैं इसके विपरीत जो लोग बुरे विचारों को लेकर सपने संजोते है वैसे ही उनकी सपनों की दुनिया बन जाती है I


अब बात करते हैं युवावस्था की इसमें प्रकृति के रस तथा तम विचारों की प्रवृत्ति अधिक मात्रा में होती है या यूं कह लें कि इनकी प्रतिशत की मात्रा अधिक होती है I पिछले विचारों का संचय अच्छा होगा तो उनकी सपनों की दुनिया भी अच्छी होगी यदि संचय बुरा होगा तो उनकी सपनों की दुनिया भी बुरी होगी I जिसका हर्जाना उनको भुगतना पड़ेगा I यहां पर अब बात करते हैं प्रौढ़ावस्था की यह अवस्था ऐसी है कि पिछली दुनिया हमने जैसी बनाई है उसी जैसा हमें भुगतना पड़ता है I अतः किसी महापुरुष ने कहा भी है कि “अच्छे विचारों की खेती करो तभी अच्छी फसल होगा सकोगे” I


 अब बात करते हैं सतोगुण की यह अवस्था प्रकृति में हमेशा विद्यमान रहती है लेकिन रज तथा तम यह दोनों गुण मिलकर इसको ऊपर नहीं उठने देते I लेकिन यदि हमारे संस्कार अच्छे हैं ,परिवार के संस्कार अच्छे हैं तो यह गुण हम पर हावी नहीं होते I इस बात को मैं हकीकत में आपसे शेयर करूंगा कि यदि हम अपने बच्चों में अच्छे विचारों के संस्कार डालेंगे तो वह अपनी सपनों की दुनिया अच्छी बना सकेंगे अब बुरे विचारों के संस्कार डालेंगे तो वह अपनी सपनों की दुनिया उजाड़ देंगे I


अतः विद्यालय हो या घर, समाज हो या अपना राष्ट्र, आज जरूरत है अच्छे विचारों की I यदि थोड़ा भी समय हम अच्छी सोहबत में गुजारेंगे तो हकीकत में हमारा घर ,परिवार, बच्चे, समाज व राष्ट्र एक सुंदर सपनों की दुनिया का निर्माण करके दिखलाएंगे I

यह तभी संभव हो सकता है जब हम धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करें ,अच्छी सोहबत में बैठे ,अश्लील बातें ,पुस्तकें व चित्र ना देखें I आज वास्तविक में जरूरत है हमें अपनी सपनों की दुनिया को सुंदर बनाने की ,आपसी प्रेम, सेवा भाव की I तो हमें भी इन्हीं तीन प्रकृति के गुणों में रहकर जो कि सत है,  रज है, तथा तम है अपने जीवन के अंतिम सांस तक ही इस लोक में व परलोक में भी अच्छी दुनिया बनानी होगी जिससे लोग हमें मरने के बाद भी याद करेंगे या यूं समझ ले कि अच्छे विचारों से हम अपने नाम को अमर कर सकते हैं I और यही असली सपनों की दुनिया है I