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"ये आकाशवाणी  का लखनऊ केन्द्र है" अरे याद आया कुछ।जी हाँ मैं बात कर रहीं हूँ ,हमारे भूले-बिसरे दोस्त रेडियो की।सचमुच ये आकाशवाणी,देवताओं की आवाज़ ही लगती थी।मारकोनी भईया का यह अविष्कार हमारे लिए किसी वरदान से कम नही था।

टेलीविजन को लोग इडियट बॉक्स कहते हैं लेकिन रेडियो को "ज्वॉय बॉक्स कहा जा सकता है। सचमुच ये खुशियों का पिटारा ही तो था,हमारे बचपन का।
पहले बिजली की बहुत समस्या थी ,हर दूसरे-तीसरे घण्टे पर लाईट कट जाती  तब मनोरंजन के भी इतने साधन नही थे,न मोबाईल,न लैपटॉप तब हमारा ये नन्हा सा साथी हमारा मन बहलाता था।एंटीना ऊपर किया,थोड़ी फ्रिक्वेंसी सेट की और लो जी शुरू हो गया मनोरंजन।
            गर्मी की छुट्टियों में जब रात में मच्छर अपना संगीत शुरू करते हम सब घुस जाते मच्छरदानी के अंदर और साथ में सुनते हवा महल,जिसमें तरह-तरह की कहानियाँ सुनाई जाती थीं।बिनाका गीतमाला भी हमारा पसंदीदा कार्यक्रम था।हेलो फरमाईश भी हम बहुत ध्यान से सुनते थे।एक सुकून मिलता था,आज मोबाईल है लेकिन सबके पास अपने-अपने,हर घर में हर सदस्य के लिए अलग मोबाईल।वो बात नही है भले ये हमें जोड़ता है लेकिन दिल से नही।
            दादा जी को जब कभी सफ़र पर जाना होता ,ये छोटा सा दोस्त हमेशा उनके साथ रहता।उन्हें अपने रेडियो से इतना प्यार था  कि एकबार रेडियो खराब हो जाने पर उन्होने खाना नही खाया,तब पिताजी ने किसी तरह रेडियो ठीक करवाया और दादाजी ने माँ से कहा," बहू,आज कुछ मीठा बनाओ आखिर मेरा दोस्त ठीक हो गया।" ये इत्तेफाक  ही था कि दादाजी के अंतिम समय में सिरहाने रखे रेडियो पर आनन्द फिल्म का गाना "ज़िन्दगी का सफर " बज रहा था।दादा जी के दोस्त को शायद एहसास हो गया था कि उसका एक साथी उससे दूर जा रहा है।आज जब दादा जी हमारे बीच नही हैं उनका ये नन्हा दोस्त आज भी उनकी याद बन कर हमारे पास है।इस छोटे से रेडियो को छूती हूँ तो लगता है बचपन फिर से लौट आया है,कभी आँखें भर आती हैं तो कभी चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाती है।दादा जी ,मैं आपके इस दोस्त को हमेशा सँभाल कर रखूँगी।

©नेहा "अनाहिता" श्रीवास्तव