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Category : World history
अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद
 Anu Jain  
 26 December 2019  

अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (1 सितम्बर 1896 – 14 नवम्बर 1977) जिन्हें स्वामी श्रील भक्तिवेदांत प्रभुपाद के नाम से भी जाना जाता है, बीसवीं सदी के एक प्रसिद्ध गौडीय वैष्णव गुरु तथा धर्मप्रचारक थे। उन्होंने वेदान्त, कृष्ण-भक्ति और इससे संबंधित क्षेत्रों पर शुद्ध कृष्ण भक्ति के प्रवर्तक श्री ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय संप्रदाय के पूर्वाचार्यों की टीकाओं के प्रचार प्रसार और कृष्णभावना को पश्चिमी जगत में पहुँचाने का काम किया। ये भक्तिसिद्धांत ठाकुर सरस्वती के शिष्य थे जिन्होंने इनको अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम से वैदिक ज्ञान के प्रसार के लिए प्रेरित और उत्साहित किया। इन्होने इस्कॉन (ISKCON) की स्थापना की और कई वैष्णव धार्मिक ग्रंथों का प्रकाशन और संपादन स्वयं किया।श्री प्रभुपाद से उनके गुरु श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने कहा था कि वह अंग्रेजी भाषा के माध्यम से वैदिक ज्ञान का प्रसार करें। आगामी वर्षों में श्री प्रभुपाद ने श्रीमद् भगवद्गीता पर एक टीका लिखी और गौड़ीय मठ के कार्य में सहयोग दिया। 1944 ई. में श्री प्रभुपाद ने बिना किसी सहायता के एक अंग्रेजी पाक्षिक पत्रिका आंरंभ की जिसका संपादन, पाण्डुलिपि का टंकन और मुद्रित सामग्री के प्रूफ शोधन का सारा कार्य वह स्वयं करते थे। ‘बैक टू गॉडहैड’ नामक यह पत्रिका पश्चिमी देशों में भी चलाई जा रही है और तीस से अधिक भाषाओं में छप रही है। श्री प्रभुपाद के दार्शनिक ज्ञान एवं भक्ति की महत्ता पहचान कर गौड़ीय वैष्णव समाज ने 1947 ई. में उन्हें ‘भक्ति वेदांत’ की उपाधि से सम्मानित किया।

लक्ष्मीबाई
 Anu Jain  
 29 December 2019  

लक्ष्मीबाईलक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी जिले के भदैनी नामक नगर में 19 नवम्बर 1828 को हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था परन्तु प्यार से उन्हें मनु कहा जाता था। उनकी माँ का नाम भागीरथीबाई तथा पिता का नाम मोरोपन्त तांबे था। मोरोपन्त एक मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे।पेशवा बाजीराव के बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक आते थे। मनु भी उन्हीं बच्चों के साथ पढ़ने लगी। सात साल की उम्र में ही लक्ष्मीबाई ने घुड़सवारी सीखी। साथ ही तलवार चलाने में, धनुर्विद्या में निष्णात हुई। बालकों से भी अधिक सामर्थ्य दिखाया। बचपन में लक्ष्मीबाई ने अपने पिता से कुछ पौराणिक वीरगाथाएँ सुनीं। वीरों के लक्षणों व उदात्त गुणों को उसने अपने हृदय में संजोया। इस प्रकार मनु अल्पवय में ही अस्त्र-शस्त्र चलाने में पारंगत हो गई। अस्त्र-शस्त्र चलाना एवं घुड़सवारी करना मनु के प्रिय खेल थे।मनु बहुत सुंदर थी। पेशवा बाजीराव उसे बहुत प्यार करते थे। मनु की सुंदरता को देखकर वह वे उसे छबीली कहा करते थे। बाजीराव के दो पुत्र थे नानासाहब और रावसाहब। मनु इन दोनो के साथ खूब खेलती थी। दोनो ने मनु को अपनी बहन बना लिया था। तीनो बच्चो का जीवन बडी हसी खुसी पढाई लिखाई और मस्ती के साथ कट रहा था।धीरे धीरे ये बालक बडे होने लगे। बाजीराव ने अपने पुत्रो को घुडसवारी सिखाने का प्रबंध किया तो मनु कैसे पिछे रहती? वह भी उन दोनो के साथ घुडसवारी करने का अभ्यास करती रही और थोडे ही दिनो में अच्छी घुडसवार बन गई।सन 1858 के जनवरी महीने में अंग्रेजी सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च में शहर को घेर लिया। लगभग दो हफ़्तों के संघर्ष के बाद अंग्रेजों ने शहर पर कब्जा कर लिया पर रानी लक्ष्मीबाई अपने पुत्र दामोदर राव के साथ अंग्रेजी सेना से बच कर भाग निकली। झाँसी से भागकर रानी लक्ष्मीबाई कालपी पहुँची और तात्या टोपे से मिलीं।तात्या टोपे और लक्ष्मीबाई की संयुक्त सेना ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्जा कर लिया। रानी लक्ष्मीबाई ने जी-जान से अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया पर 17 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गयीं।

लिओनार्दो दा विंची
 Anu Jain  
 31 December 2019  

लिओनार्दो दा विंचीलिओनार्दो दा विंची का जन्म इटली के फ्लोरेंस प्रदेश के विंचि नामक ग्राम में हुआ था। इस ग्राम के नाम पर इनके कुल का नाम पड़ा। ये अवैध पुत्र थे। शारीरिक सुंदरता तथा स्फूर्ति के साथ साथ इनमें स्वभाव की मोहकता, व्यवहारकुशलता तथा बौद्धिक विषयों में प्रवीणता के गुण थे।लिओनार्दो दा विंची का बचपन अपने दादा के घर में ही बीता था | सन 1469 में लिओनार्दो दा विंची के पिता उनके साथ फ्लोरेंस आ गये जहा पर उनकी चाची ने उनकी कई वर्षो तक देखभाल की थी | फ्लोरेंस में ही उनकी शिक्षा दीक्षा पूर्ण हुयी थी | स्कूल से ही लिओनार्दो दा विंची की प्रतिभा सामने आने लगी थी जबकि गणित की मुश्किल से मुश्किल समस्याओ का समाधान वो चुटकियो में ही कर लेते थे | सन 1482 इस्वी तक उन्होंने विविध विषयों में शिक्षा प्राप्त कर ली थी |लिओनार्दो दा विंची ने कई अभूतपूर्व आविष्कारों की डिज़ाइन तैयार की थी। उनके इन चित्रों में अलार्म घड़ी, पनडुब्बी, हेलीकॉप्टर, टैंक, पैरासूट जैसे इंजीनियरिंग उपकरणों की डिज़ाइन थी। यह लिओनार्दो की कल्पना भी कही जा सकती है की उन्होंने कई वर्ष पूर्व ही ऐसे उपकरणों का अनुमान लगा लिया था।गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड के अनुसार लियनार्डो कि मोना लिसा कि पेंटिग इतिहास में सबसे ज्यादा इंश्योर्ड पेंटिंग है. साल 1911 में पेरिस के लौव्रे म्यूजियम से चोरी होने के बाद यह सबसे फेमस तस्वीर बन गई. 2015 में इसकी कीमत 780 मिलियन यु एस डॉलर थी. आश्चर्यजनक बात यह है कि लियनार्डो ने मोना लिसा की आंख की दाई पुतली पर अपने हस्ताक्षर किये थे.- लियनार्दो एक समय में अपने दोनों हाथों से काम कर सकते थे. मसलन अगर एक हाथ से वो लिख रहे हैं तो दूसरे हाथ से पेंटिंग बनाते रहते थे