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Category : Social Awarness
कृपया सोचिएगा जरूर
 Rewa Tibrewal  
 5 February 2018  

रविवार को मैंने एक मूवी देखी ,मूवी देखते समय काफी रोई मैं ,देख के घर तो आ गयी पर आज दिन तक दिमाग वही घूम रहा है।मैंने तो सिर्फ एक नाट्य रूपांतर देखा है तब ये हाल है , पर जिन बच्चियों और औरतों के साथ ऐसा होता है उनके मन की स्थिती को समझना या बयां करना बहुत मुश्किल है।लेकिन न चाहते हुए भी ऐसा हर दिन होता है , क्या हमारी कोई ज़िम्मेदारी नही ??? हम भी तो इस समाज का हिस्सा है ....तो क्या डर कर चुप रह कर हम अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर रहे है ???हम बेटियों को कितना सिखाते हैं ....उनके कपड़ों से लेकर मर्दों के कितने पास या दूर रहना है वहां तक , थोड़ी बड़ी होने पर हम उन्हें उनके बाप भाई तक से सतर्क रहने को बोलते हैं। लेकिन क्या हम अपने बेटों को सिखाते हैं कि उन्हें स्त्रियों से कैसा बर्ताव करना चाहिए ?? जब पहली बार उन्हें खुले में शौच कराते हैं तो सोंचते हैं कि कितना गलत कर रहे हैं हम ???? खुले में लड़की हो या लड़का नही जाना चाहिए न , आगे जा कर ये ही बातें गलत रूप लेती हैं ।नही हम नही सोचतेे आम धारणा तो ये है "अरे ये तो लड़का है " इसी धारना से बढ़ावा मिलता है । क्या हम ये मुहिम नही शुरू कर सकते कि हम अपनी बेटियों के साथ साथ अपने बेटों को भी उस बारे मे शिक्षित करेंगे ???कृपया सोचिएगा जरूर ।।।।रेवा

मानवीय आदर्शों की ज़रूरत
 Sahil Tanveer  
 18 February 2018  

अभी वर्तमान में हमारे देश में जिस तेजी से असामाजिक गतिविधियां बढ़ रही हैं ; संभव है कि भारत भारत ना रह पाए, अपनी गरिमा खो दे । देश धीरे-धीरे आपसी कलह जैसे कैंसर का शिकार होते जा रहा है । देशभक्ति के रोज नए पैमाने तय किए जा रहे हैं । सुरक्षा प्रशासन के हाथों से निकलकर असामाजिक तत्वों तक पहुंच रही है । राष्ट्रवाद पर रोज नया संग्राम छिड़ रहा है । दो विभिन्न विचारधाराओं की लड़ाई व्यक्तिगत होते जा रही है । नफरतों की चिंगारियां फिजाओं में घुल-मिल रही है , जिसकी चपेत में ज्यादातर आज की युवा पीढ़ी आ रही है । ये ऐसा सबकुछ एक दो वर्षों में नहीं हुआ बल्कि बीते कई वर्षों से ये सब चला आ रहा है । हां,लेकिन ये शत्-प्रतिशत सत्य है कि इधर एक दो वर्षों में इसने आक्रामक रूप धारण कर लिया है और यह अभी देश की सबसे बड़ी चुनौती है । छोटे-छोटे मुद्दे अचानक से विशाल रूप धारण कर रहे हैं और एक बड़े मुद्दे को इस तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया जा रहा है कि किसी को कानों कान खबर नहीं हो रही । अभी वर्तमान के मुद्दों पर एक नज़र डालने से सारी बातें स्पष्ट हो जाएंगी । दूसरों को गलत,नीचा दिखाने के लिए देशभक्ति का सहारा लेना एक ट्रेंड बन गया है । और तो और देश की प्रमुख हस्तियां भी इसमें पीछे नहीं है । सभी राष्ट्र की दुहाई देकर एक दूसरे की टांग खिंचाई कर रहे हैं। और इस कड़ी में हमारे राजनितिज्ञ सबसे आगे हैं । राजनितिक पार्टियां सही-गलत ना देखकर वोट बैंक के हिसाब से काम कर रही है । राजनितिक शक्तियां हमारे समाज के उपर हावी हो रही है । जिसका परिणाम हम स्पष्ट रूप से तनावग्रस्त समाज के रूप में हम देख रहे हैं । आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ये जानने के लिए हमें रविन्द्र नाथ टैगोर ने राष्ट्र को लेकर जो बातें कही थी उसपर गौर करने की जरूरत है :-"लोगों के राजनितिक और आर्थिक संघ के अर्थ में,राष्ट्र एक ऐसा दृष्टिकोण है,जो सारे देशवासी किसी यांत्रिक उद्देश्य से संगठित होकर अपनाते हैं । समाज का अपना कोई बाहरी प्रयोजन नहीं होता । यह खुद अपने आप में साध्य होता है । यह मानव के सामाजिक प्राणी होने की स्वैच्छिक आत्माभिव्यक्ति होता है । यह मानवीय संबंधों की प्राकृतिक व्यवस्था है ताकि मनुष्य एक-दूसरे को सहयोग देने की नीयत से जीवन के आदर्शों का विकास कर सके । इसका एक राजनितिक पहलू भी होता है लेकिन वह किसी खास प्रयोजन के लिए ही होता है । वह आत्मसंरक्षण के लिए होता है । वह शक्ति का एक रूप होता है, न कि मानव आदर्शों का । शुरू में,समाज में,इसका अलग से स्थान निर्धारित था,जो केवल व्यावसायिक लोगों के लिए ही था । विज्ञान की सहायता एवं इस संगठन के परिष्कार के बाद इसकी शक्ति बढ़ने लगी और उसी के साथ अकूत संपदा आने लगी । तब आश्चयर्यजनक तेजी से उसने अपनी सीमाएं लांघनी शुरू कर दीं । फिर तो इसने भौतिक संपन्नता के लालच में अपने सभी पड़ोसी समाजों को उकसाना शुरू कर दिया । परिणामस्वरूप उनमें परस्पर ईर्ष्या रहने लगी तथा दूसरों के विकास के भय से इसने खुद को शक्तिशाली बनाना शुरू कर दिया । फिर इसे रोक पाना संभव नहीं रहता क्योंकि तब स्पर्धा तेज हो जाती है,संगठन व्यापक होने लगता है और स्वार्थ परम तत्व बन जाता है । मानव के लालच और भय को भुनाते हुए यह समाज में ज्यादा से ज्यादा स्थान घेरने लगता है और बाद में वहीं इसकी निर्णायक शक्ति बन जाता है" (राष्ट्रवाद पृष्ठ-28)आज के इस समय में हम इसी शक्ति  से घिरते जा रहे हैं । हम मानवीय मूल्यों,मानवीय आदर्शों को खोते जा रहे हैं जिसे अभी वर्तमान की सख्त जरूरत है । और यह तभी आ सकता है जब हम किसी राजनितिक, धार्मिक ,सामाजिक और अन्य ऐसी ही संगठनों से ऊपर उठकर मानवीय मूल्यों और आदर्शों के बारे में सोचें ।        - 'साहिल' तनवीर

भारत में पाँव पसारता बाबावाद और अंधविश्वास
 Arpit Dwivedi  
 19 March 2018  

यदि किसी समाज का आर्थिक विकास की अपेक्षाकृत बौद्धिक विकास न हो तो वह समाज अंधविश्वासों में और भी गहरे धंसता चला जाता है। फिर उस समाज में लोगों के अंधविश्वास का फायदा उठाकर अपना घर भरने वाले परजीवियों का साम्राज्य विकसित होने लगता है।भारत के मामले में यही हुआ है। 90 के दशक में उदारीकरण के बाद मध्यम वर्ग के लोगों के जीवन स्तर में तेजी से सुधार हुआ। इससे पहले जहाँ टीवी, फ्रिज और स्कूटर जैसे सुख साधन कुछ खास लोगों की पहुंच में ही हुआ करते थे, फिर ये आम लोगों की पहुंच में भी आने लगे। जब लोगों की आमदनी बढ़ी तो उसके साथ ही बाजार भी तरह तरह के उत्पादों से पट गया। फिर स्वयं को एक दुसरे से श्रेष्ठ और साधन संपन्न दिखाने की होड़ शुरू हुयी। इस होड़ ने मध्यम वर्ग की शांत जिन्दगी में खलबली मचा दी। एक दौड़ शुरू हो गई जिसमें सबको आगे निकलना था। महत्वकांक्षाओं से संचालित इस दौड़ ने लोगों के मन में भय, असुरक्षा और लालच को जन्म दिया। लालच से भरे डरे हुए लोग परजीवियों के लिए एक आसान शिकार थे। और इस शिकार के लिए उन्हें कोई विशेष प्रयास की आवश्यक्ता भी नहीं थी। उन्हें तो बस अपना मुहँ खोलकर बैठ जाना था, क्योंकि शिकार तो खुद ब खुद चलकर उनके पास आ रहा था।इस दौरान लोगों द्वारा धार्मिक कार्यों में किया जाने वाला खर्च अचानक ही बहुत बढ़ गया। पहले जहाँ धार्मिक आयोजन के नाम पर बस सत्यनारायण की कथा हुआ करती थी अब माता के जागरण जैसे भव्य आयोजन होने लगे। ऐसे आयोजनों ने लोगों को अपनी संपन्नता और धार्मिकता के प्रदर्शन का अवसर तो मुहैया कराया ही इनके साथ साथ दैवीय कृपा प्राप्त कर लेने का आश्वासन भी दिया। देखते ही देखते देश भर में जागरण पार्टियों की बाढ़ आ गई। इसके साथ ही धार्मिक पर्यटन और मंदिरों की आय में भी भारी वृद्धि हुयी।इससे पहले जहाँ लोग जीवन में एक बार तीर्थ यात्रा संपन कर लेने को उपलब्धि मानते थे वहीँ अब पिकनिक की तरह तीर्थ यात्राएं होने लगीं। यहाँ तक की बद्रीनाथ केदारनाथ और अमरनाथ जैसे दुर्गम तीर्थ स्थलों पर भी लोग हर वर्ष हाजिरी देने जाने लगे। जो थोड़े कम साहसी थे उन्होंने अपने आस पास ही किसी धर्मस्थल को चुन लिया जहाँ वे नियमित अन्तराल पर हाजिरी लगाने जाने लगे। जैसे मथुरा वृन्दावन में हर सप्ताहांत पर आस पास की जगहों से लोग पहुँच जाते हैं। इनमें सबसे ज्यादा संख्या दिल्ली एनसीआर के संपन्न लोगों की होती है। इनमें से कुछ लोग तो ऐसे होते हैं जो हर सप्ताह दिल्ली से बिना नागा हाजिरी देने पहुँच जाते हैं। विशेष अवसरों पर तो यहाँ इतनी भीड़ जुटती है कि व्यवस्था चरमरा जाती है। तीर्थयात्रियों की बढती भीड़ को भुनाने के लिए पिछले कुछ वर्षों के दौरान यहाँ कई भव्य मंदिरों का निर्माण हुआ है।इसके साथ ही कथावाचकों और प्रवचनकर्ताओं का धंधा भी चल निकला। कथावाचकों के पंडालों में भीड़ उमड़ने लगी। आसाराम तथा उस जैसे कई अन्य कथावाचकों ने इस अवसर का जमकर लाभ उठाया और स्वयं को एक ब्रांड की तरह धर्म और अध्यात्म के बाजार में स्थापित कर लिया। उनके अनुयायियों की भारी भीड़ ने उनको शोहरत और राजनीतिक ताकत के साथ साथ ढेर सारा धन भी दिया। इस धन का उपयोग उन्होंने अपने प्रचार के लिए किया और इसके जरिये प्रचार के सबसे सशक्त माध्यम टीवी तक अपनी पहुँच बना ली। अब इनके प्रोग्राम टीवी पर प्रसारित होने लगे। लगभग सभी मुख्य चैनलों पर सुबह का स्लॉट इनके लिए बुक हो गया। टीवी पर आना इनके लिए बहुत फायदे का सौदा साबित हुआ। टीवी के जरिये इन्होने घर घर तक अपनी पहुँच बना ली और इनके अनुयायियों की संख्या और साथ ही लाभ में भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ोतरी हुई। इसने मिडिया जगत में कुछ लोगों के कान भी खड़े कर दिए। वे भी इस धर्म और अध्यात्म की बहती गंगा में लाभ की संभावनाएं तलाशने लगे।मुंबई में एक प्रोडक्शन हाउस चला रहे भूतपूर्व पत्रकार माधव कान्त मिश्रा ने इस सम्भावना को सबसे पहले पहचाना और सन 2000 में उन्होंने आस्था नामक चैनल को लांच कर दिया। इस चैनल ने जनता तक अपनी पहुँच बनाने के लिए बेताब बहुत से गुरुओं और कथावाचकों के लिए संभावनाओं के द्वार खोल दिए। शुरू में इस चैनल पर प्रसारित होने वाली सामग्री के लिए कोई कीमत नहीं वसूली जाती थी। लेकिन बढती मांग ने इसको ज्यादा दिन फ्री नहीं रहने दिया। क्योंकि ऐसे बाबाओं और गुरुओं की कोई कमी नहीं थी जो खुद को टीवी पर दिखाने के लिए अच्छी खासी कीमत देने को तैयार थे। इस बढती मांग को भुनाने के लिए धडाधड धार्मिक चैनल लांच होने लगे। इन चैनलों में अधिकांश का स्वामित्व किसी न किसी धर्मगुरु के पास ही था। इस तरह इन चैनलों के जरिये ये दोहरा लाभ कमाने लगे। आस्था चैनल के स्वामित्व को भी बाद में बाबा रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण ने खरीद लिया। बाबा रामदेव को योगगुरु से एक सफल व्यवसायी के रूप में स्थापित करने में इस चैनल का बहुत बड़ा हाथ है।टीवी के जरिये होने वाले प्रचार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि आप सीधे ही लक्षित उपभोक्ताओं तक पहुँच बना सकते हैं। आज के दौर में टीवी देखने में ज्यादा समय व्यतीत करने वाले अधिकांश लोग औसत बुद्धि के ही होते हैं। उनमें भी जो लोग धार्मिक चैनलों को देखते हैं वे तो बुद्धि में औसत से भी नीचे होते हैं। ऐसे लोगों को आसानी से बुद्धू बनाया जा सकता है।इन चैनलों ने किसी तरह जजमानी करके गुजारा कर रहे ज्योतिषाचार्यों को भी संभावनाओं का मार्ग दिखाया। जीवन की दौड़ में आगे निकलने को लालायित और जीवन की अनिश्चितताओं से डरे हुए लोग अपना भविष्य जान लेने को आतुर थे। वो वह हर संभव तरकीब आजमा लेना चाहते थे जिससे वे किसी तरह सम्रद्धि हासिल कर सकें और जीवन की अनिश्चितताओं को लेकर संतुष्ट हो सकें। ऐसे लोगों का दोहन करने के लिए ज्योत्षी, वास्तुशास्त्री, हस्तरेखा विशेषज्ञ, तांत्रिक, टैरो कार्ड रीडर जैसे परजीवी तैयार बैठे थे। टीवी ने इनको अपने प्रचार का मंच उपलब्ध करा ही दिया था। कुछ ही समय में धार्मिक चैनलों पर ज्योतिष के प्रोग्रामों की लाइन लग गई। फुटपाथ पर बिकने वाली ज्योतिष की चार किताबें पढकर अपनी वाकपटुता और लोगों के ठगने के टैलेंट में निपुण लोग टीवी पर ख़रीदे हुए स्लॉट के जरिये प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य बन गए।टीवी के जरिये ज्योतिष का इतना अंधाधुंध प्रचार हुआ कि लोग हर छोटी बड़ी बात के लिए ज्योत्षियों के पास भागने लगे। नयी कार निकालने से लेकर बच्चे के जन्म का मुहूर्त भी ज्योतिष के आधार पर निर्धारित किया जाने लगा। लोग अपने घर का नक्शा बनवाने के लिए आर्किटेक्ट के बजाये वास्तुशास्त्रियों को महत्व देने लगे और जिनके घर बन चुके थे वे अपने घर को वास्तु के अनुसार तोड़फोड़ कर ठीक कराने लगे। अब लगभग सभी लोगों के हाथों में जेमस्टोन और गले में तरह तरह के लॉकेट दिखाई देने लगे। ग्रहों को प्रसन्न करने के लिए लोग ज्योत्षियों की सलाह पर महंगे महंगे पूजा-पाठ, मन्त्र जाप और हवन इत्यादि करवाने लगे।ये चैनल ठगों के लिए इतना उपयोगी माध्यम साबित हुए की कल तक अख़बारों के क्लासिफाइड, बसों, ट्रेनों और सार्वजानिक शौचालयों में पर्चे चिपकाकर अपना प्रचार करने वाले बाबा बंगाली भी टीवी पर अपनी दुकान खोलकर बैठ गए। फिर समोसे को लाल हरी चटनी से खाने पर भी कृपा आने लगी। बस स्टैंड के पीछे, पीपल के पेड़ के नीचे मर्दाना कमजोरी का इलाज करने वाले हकीम जी भी टीवी पर पहुँच गए। मोटापा, डायबिटीज, कैन्सर, माइग्रेन, अस्थमा जैसी बिमारियों के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के नाम पर तरह तरह के उत्पाद बेचे जाने लगे। जिन लोगों ने कभी कॉलेज का मुहँ भी नहीं देखा वे भी टीवी पर डॉ साहब, वैध जी, हकीम जी के नाम से प्रसिद्ध हो गए।  बरहाल ये दौर अभी भी जारी है और निकट भविष्य में भी इसमें किसी बड़े बदलाव के आसार फ़िलहाल दिखाई नहीं दे रहे हैं। अन्धविश्वास का जहर आज भी लगातार विभिन्न माध्यमों से समाज में फैलाया जा रहा है। भारत में तेजी से पैर पसारते बाबावाद के पीछे यही प्रचार जिम्मेदार है जिसका पैसा आता तो अमीरों की जेब से है, लेकिन इससे सबसे ज्यादा नुकसान निम्न वर्ग के लोगों का हुआ है। क्योंकि रईस लोगों ने तो केवल अपना थोड़ा सा धन खोया, लेकिन वे गरीब लोग जो किसी तरह कठिनाईयों में अपना जीवनयापन कर रहे हैं अपना सब कुछ लुटा बैठे। जिन बाबाओं और गुरुओं को वे ईश्वर के समकक्ष मान कर अपने उद्धार की आशा कर रहे थे उन्होंने न केवल उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से ठगा बल्कि उनकी बहन बेटियों की इज्जत भी तार-तार कर डाली।

अपने या पराये?
 Manisha Joban Desai  
 26 April 2018  

कहानीअपने पराये      सुजीता दोपहर  की चाय बना रही थी, की डोरबेल बजी।सोफे पर बेठी उसकी सासने उसके हस्बैंड का लेबोरेटरी से आया नया रिपोर्ट लिया और पढ़कर,'हे भगवान ये कैसी मुसीबत हमारे परिवार पार आ गिरी है?"किचन में से भागती सुजीता आयी और जल्दी से रिपोर्ट देखा,साथ में डॉक्टर ने बम्बई के किसी बड़े अस्पताल में जाजा़कर इलाज कराने की चिट्ठी भी लिखी थी।सुजीता की आँखों से आंसू बरस पड़े।उसकी सास तो अगली पिछली बाते निकालकर सुनाती रही।"तेरा कुछ ध्यान नहीं है,तेरी पार्ट टाइम नौकरी और छुट्टी के दिन सहेलियों के साथ किटी पार्टी …"वगैराह'धीरे बोलिये मम्मीजी अभी उनकी तबियत ठीक नहीं है, आज डेढ़ महीना हो गया ऑफिस भी नहीं जा रहे,ये सब सुनेंगे तो और ज्यादा दुखी होंगे।अब तो हमें कैसे उनको जल्दी इलाज करके ठीक करना है और इतने लम्बे समय तक चलनेवाली ट्रीटमेंट का खर्च भी तो जुटाना है।उनके इन्शयोरन्स का पैसा भी काफी नहीं हैऔर हम सब महिला किटी में सिर्फ मज़ा करने थोडे जाते है ?सामजिक कार्यो से भी तो जुड़े है,आप हमेशा मेरी गलती निकलती रहती है और हमारी नन्ही सी गुड़िया बेटी  त्रीया से भी रुखा व्यवहार करते है।ये सुनकर सुजीता की सास शांत होकर अपने रुम में चली गयी।सुजीता ने सबको चाय दी और अपने पति रूवीन को धीरे धीरे बाते समजा़ने लगी की, अब हमें बाहर जाकर इलाज करवाना पडेगा।दूसरे दिन से सुजीता तैयारी में जुट गयी।अपनी पांच सालकी बेटी त्रिया की रेसीडेंशल स्कूल से इतनी तो राहत थी की बच्ची उतने समय स्कूल की होस्टेल मे अच्छी निगरानी में रहे सकेगी।त्रीया को समजा़कर  उसकि दो तीन फ्रेंड वगैराह को बुलाकार समजा़ लिया।अपनी ऑफिस से बिना सेलेरी से दो महीने की छुट्टी भी लीउसकी सास ने दो तीन सम्बंदिओ से फोन करके बात की और कुछ आर्थिक मदद के बारे मे भी बताया लेकिन सबने कुछ न कुछ बहाने बनाकर ताल दिया।सुजीता की दो तीन सहेलियों का फोन आया और सुजिताने अपनी मुश्किल बतायी लेकिन सबने हाँ सोचेंगे वगैराह बाते की।उसकी सास भी साथ आने को तैयार हुई लेकिन सुजिताने कहा,आप को तकलीफ होगी मेरा भाई थोड़े दिन छुट्टी लेकर साथ रहेगा फिर जैसे ट्यूमर का  पहला माइनर ओपरेशन हो जाएगा बाद मे रिपोर्ट आये फिर आप आना"बातें कर रहे थे उतने में सुजीता की किटी पार्टी के प्रमुख नीताबेन और साथ में ओर दो बहेनें आयी और सुजीता को आश्र्वस्त करते हुए एक चेक दिया और कहने लगे,"आप बिलकुल चिंता मत करना,अपनी संस्था के भंडोल से सबने मिलकर ये रकम आपको इलाज के लिए दे रहे है जिसमें आधा तो हम सब की तरफ से है और आधी रकम आप धीरे धीरे करके भर सकेंगे ,ईश्वर की कृपा से सब कुछ ठीक हो जाएगा”बोलते सबकी आँखे भर आयी और सुजीता आंसू भरी आंखो से धन्यवाद करते हुए अपनी सास की सबसे पहचान करवाई।सुजीता की सास भी एकदम से रो पड़ी और सबसे धन्यवाद करते हुए बोली,"सुजीता,सचमें समय बदलते ही कभी अपने पराये  हो जाते है और जिन्हें पराये समझते है वो अपने बन जाते है "-मनीषा जोबन देसाई

ग्लोबल वार्मिंग और हम
 Manisha Joban Desai  
 26 April 2018  

Happy earth day 2018विषय-वैश्विक तापमान कारण और निवारणसदियों से तपती इस धरा पर जाने कितने अत्याचार और बदलाव आये है।वैसे तो कुदरत से मिली हरेक सम्पति से वो भरपूर है,लेकिन मानवजाती ने खुद को और अपनी आनेवाली पीढी को ब्रह्मांड में एक नयी पहचान देने की जब से ठान ली हैऔर इसके लिए जाने कितने ही आविष्कारों से धरती को सजायें जा रहे है।क़ुदरत की अखुट संपत्ति से लबरेज़ हरियाली धरती अब कहीं कहीं से बंज़र दिखती जा रही है।अपने आपको विश्वमानव बनाने की धुन थी तब तक तो ठीक था,लेकिन वहाँ से ओर ऊपर उठकर अवकाश में भी अपनी जगा बनाकर सब से ताकतवर बनने की होड़ लगी है।औद्योगिक क्रान्ति तो मानवजात के उज्जवल भविष्य के लिए बहुत ही आवकारदायक कदम है लेकिन केमिकल के उपयोग से दूषित पानी की समस्या और समुद्रजीवो के निकंदन से जैविक संतुलन बिगड़ रहा है।सरकार के द्वारा क़ानून बनाकर ठोस कदम उठाये गए है, लेकिन अपनी महत्वकांक्षाओ को "स्काय इस घ लिमिट "समजनेवाले ग्लोबल विकासी कहीं रुकने को तैयार नहीं।कन्स्ट्रक्शन इंन्डस्ट्री में भी काफी पेैबंदिया लगाने के बावजूद बेफाम बढ़ती बहुमाली इमारतों की वजह से महानगरों में काफी दिक्कतों का सामना कर रहे लोग।जैसे न्यूयॉर्क में कभी ऐसा भी हुआ था की ऊँची इमारते बनने लगी और आमने सामने स्ट्रीट बन गयी तो कम गेप छोड़ने की वजह से अन्धेरा रहने लगा और फिर नियम बनाये गए ,उसी के मुताबिक़ डेवलोपमेन्ट बढ़ाया जा रहा है लेकिन अब भी जैसे जैसे डेवलोपमेन्ट बढ़ा मार्किट एरिया और रहेने की पुरानी जगाओ पर वही समस्याए खड़ी हे। जैसे ट्राफिक की वजह से कितने मानवसमय का क्षय हो रहा है और मेरे ख्याल से जल्दी पहुंचने की दौड में जो आविष्कार किये गए उस के बावजूद वहीं के वहीं रहे जा रहे है।टेक्नोलोजी -मोबाईल-कमप्युटर उद्योगों का धुंआ और पेट्रोल डीज़ल का प्रदुषण दोनों मानवजीवन की शारीरिक क्षमता को क्षीण कर रहे है।समजदार देश भी अपनी ताकत दिखाने के लिये अणुपरिक्षण का मोह छोड नहीं रहें।खुले वातवरण से मिलनेवाली शुद्ध हवा जैसे महानगरों में एक याद बन गयी है।दूषीत पानी और दूषीत हवा से कितनी भयंकर बीमारियों का शिकार बन रहा हे मानवी।वैसे तो सरेराश आयु बढ़ी है मेडिकल संशोधन के कारण,लेकिन फिर भी समस्याएं कम नहीं हुई।सो साल जीने की तमन्ना करने वाला इंसान एक के बाद एक समस्याओ से ज़ुज़ रहा है, ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह जंगलो का काटना,और प्लास्टिक का ज्यादा उपयोग होने की वजह से "ओज़ोन "लेयर में ब्लेक हॉल का विस्तार बढ़ा जिसकी वजह से सूरज की तेज रेडियन किरणे बढ़ने लगी,जो स्किन कैंसर वगैराह बढ़ने का मुख्य कारण है। ये तो सब समस्याए है,लेकिन उसका उपाय भी वही बुद्धिजीवियों को ढूंढना होगा जिन्होंने ये सब खड़ा किया है,नयी पिढी को इस समस्या से अवगत कराके उन्हें कुदरत से ज्यादा नजदीक रहने से लिए सामाजिक जागृति अभियान और हमारे गाँवों में भी जिस तरह से आधुनिकरण हो रहा है वहाँ पर वर्कशॉप करके और स्कूल के विद्यार्थी और शिक्षकों द्वारा ज्ञानजाग्रुति अभियान चलायें तभी सब आनेवाली पीढ़ी के लिए पानी,हरियाली शुद्ध हवा और हमारे जरुरी खनिज वगैराह बचा सकेंगे ।सिर्फ हमारी सरकार के प्रयत्न ही नहीं सभी को खुद समज़कर अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारना बंध करना चाहिए।"जय ग्लोबल विश्व”जब सब अच्छे से जियेंगे तभी तो जीवन आगे बढ़ेगा।-मनीषा जोबन देसाई सूरत -गुजरात -इण्डिया

क्या कहती हैं विज्ञापन की छवियाँ
 Jiya Prasad  
 20 May 2018  

जीवन एक बहुत बड़ा फ़लक है जिसमें तमाम तरह के अनुभव सांस लेते हैं। यह किसी बैंक खाते के अंदर मौजूद दूसरा छोटा खाता होता है जिसमें हम अपनी थोड़ी थोड़ी बचत रखते जाते हैं और जरूरत के समय उसका उम्दा इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं। जब रोज़मर्रा में कुछ अलहदा टकराता है तब एक के बाद एक अनुभव खुलने लगते हैं। ये अच्छे और बुरे तो होते ही हैं और संख्या में भी अधिकहोते हैं।हम औरतों के लंबे से अनुभव संचय होते रहे हैं। हमारे समय की एक विशेषता यह भी है कि अनुभवों के कई तरह की सतहें जुड़ रही हैं और इनका रुख बाहर की दुनिया की ओर भी है। अब किसी भी औरत के पास अपने दफ़्तर, स्कूल, कॉलेज, सड़क, दुकान, बाज़ार, पार्क आदि जगहों से जुड़े कई तजुर्बे बनते हुए दिखाई और सुनाई देते हैं। निश्चित तौर पर हम एक लंबा सफर कर के आ रहे हैं और आज अपने हकों के लिए लगातार आवाज़ उठा रहे हैं। फिर भी हमें उन छवियों से सावधान रहना ही पड़ेगा जिनमें एक ‘इंसान’ को वस्तु या एक ही फ्रेम में क़ैद करके पेश किया जा रहा है। वास्तव में विज्ञापन की दुनिया में या फिर डिजिटल जगत में छाई हुई कुछ छवियों पर एक संज्ञान लेने की इस युवा महिला-पुरुष पीढ़ी को ज़रूरत है। हमारे साथी पुरुषों को यह सोचना ही होगा कि औरत कोई बे-दिमाग प्राणी या रोबोट नहीं है जो एक अदना सा सेंट सूंघकर उस पर फिदा हो जाएगी। जब भी इस तरह के विज्ञापन टीवी पर प्रसारित हों, तब यह जरूर सोचें कि यह अपने उत्पाद को बेचने की घटिया रचनात्मकता भर है और उन पर तरस खाएं। महिलाओं को यह जरूर मुंह खोल कर और तेज़ आवाज़ में बताना चाहिए कि यह एक घटिया विज्ञापन है जो सरासर भ्रामकता पैदा करता है। प्रेम और मोह जैसे भाव नितांत आत्मिक होते हैं जिनका सेंट और उसकी महक से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है। फोन सेवा देने वाली भारत की एक बड़ी कंपनी का विज्ञापन बेहद आराम से आधी आबादी को एक सेविका के ही फ्रेम में फिट करने का गेम खेल रही है। विज्ञापन का सार यह है कि पत्नी दफ़्तर में मालकिन है और पति एक कर्मचारी। वह महिला काम के प्रति प्रतिबद्ध है। लेकिन दूसरे ही दृश्य में वह घर पर जाकर खाना बनाती है और वीडियो कॉल करके इंतज़ार करने की बात कहती है। यह विज्ञापन पहली नज़र में बिलकुल सादा और आकर्षक है। लोगों को प्रेम सा एहसास देने के लिए काफी है। लेकिन यह बहुत खतरनाक है कि दफ्तर में भी काम करो और घर पर जाकर खाना बनाओ। वास्तव में जिस बात को हल्के से लिया गया है वह महिला श्रम है। थकान दोनों को होती है। घर और उसके अंदर के भाग भी लंबे समय से औरतों के लिए पक्के किए जाते रहे हैं। जैसे दहलीज़ पर नहीं खड़ा होना चाहिए, खिड़की से नहीं झांकना चाहिए आदि। जब मेहमान आए तो कोई लड़की उनके सामने न आए, जैसी रस्म आज भी हमारे कस्बों और शहरों में दिखती है। दरवाज़ों पर लगे पर्दों का पूरा विमर्श ही हम औरतों को इंगित करता है। इन सब से अधिक रसोई के अंदर जमी हुई छवि माँ व पत्नी के नाम ही सुपुर्द है। इसलिए कहीं न कहीं इन परंपरागत छवियों को चटकाना जरूरी है। एक बार चटकी तो टूटेंगी जरूर। इसी तरह एक मोटर साईकिल का विज्ञापन टीवी पर दिखाया जाता है। विज्ञापन के नेपथ्य में एक राजस्थानी गाना चलता है जो सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन इस विज्ञापन पर पर्याप्त निगाह डालकर समझना जरूरी है। महिला पानी भरने दूर रेगिस्तान में गई है और उसके पास लगभग पाँच पानी के धातु के छोटे-बड़े घड़े हैं। वह राह पर खड़ी है। तभी एक मोटर साईकिल वाला आता है और वह पीछे बैठती है। अपने सिर पर लगातार पाँचों घड़ों को लिए बैठी, वह यह देखती है कि घड़े गिर नहीं रहे हैं। मोटर साईकिल ऐसे चलाई जाती है कि महिला को झटके नहीं लगते और उसका पानी नहीं गिरता। अंत में गाने में कहते भी हैं- ‘झटका झूठ लागे रे!’ विज्ञापन भले ही मोटर साईकिल के पुर्जों और बनावट का है फिर भी राजस्थानी महिला की वही पूर्ववत छवि है। अब या तो राज्य सरकारों ने अपना काम इतने सालों से ठीक नहीं किया कि आज भी उन्हें पानी लेने जाना पड़ता है। या फिर इन कंपनियों के रचनात्मक विभाग इतने दयनीय क्यों होते हैं कि वे किन्हीं दूसरी छवियों के बारे में सोच नहीं पाते? एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि जब गूगल पर अंग्रेज़ी में विलेज़ विमीन टाइप किया जाता है तब महिलाओं के घिसे-पिटे चित्र भी साथ में दिखाये जाते हैं। उनमें से अधिकतर गाँव की महिलाओं को चूल्हा-चौका, खेतों में काम करते हुए, पनघट में पानी भरते हुए मटकों के साथ, रोटी थापते हुए, घर की चार दीवारी में, किसी के इंतज़ार में रहते हुए दिखाया गया है। दिलचस्प यह है कि उनके पास गाँव की महिलाओं की किसी दूसरी छवि की कल्पना ही नहीं है। यह एक अदृश्य पर भयानक तथ्य है। जिसे हम बेहद सामान्य तौर-तरीकों से लेते हैं। इसलिए गढ़ी गई छवियों से डर लगता है। यह ख़्वाहिश है कि ये सभी गढ़ी हुई छवियाँ टूटे और हम भी किसी कलाकार के रूप में, यात्री के रूप में, किसी फोटोग्राफर के रूप में, जंगल में सफारी करते हुए, आसमानी राइडिंग करते हुए, समुद्री ट्रिप का मज़ा लेते हुए आदि छवियों में दिखें और पहचानी जाएँ। ये सब छवियाँ ऐसा नहीं हैं कि मौजूद नहीं हैं पर वे सिर्फ एक वर्ग तक सीमित हैं। एक आम महिला भी यह सब कर ही सकती है तो वे क्यों न दिखे! अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के आने पर हम महिला सशक्तिकरण की बातें करने के मोड में आ जाते हैं। रैलियाँ निकाली जाती हैं। बैनर बड़े आकार में दिखने लगते हैं। कुछ ख़ास क़िस्म के नारे तेज़ आवाज़ों में सुनाई देने लगते हैं। सरकारी और गैरसरकारी संगठन अपनी आवाज़ें बुलंद करते हैं। आधी आबादी तुरंत ब्रेकिंग न्यूज़ की तस्वीरों में बदल जाती है। ये सब अच्छा है लेकिन उन मुद्दों का क्या जिनकी वास्तव में खबर लेनी चाहिए। देश में अब भी उन कच्चे और पके हुए औरताना अनुभवों की सुध नहीं ली जाती जो आधी आबादी के सशक्तिकरण के संकेतक हैं। पढ़ चुकी बिटियाओं के लिए अब भी रोजगार दूर का चाँद है जो बस दिखता है पर कभी हासिल नहीं होता। सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है। इन सब मुद्दों के साथ बाज़ार द्वारा घटिया और परंपरागत जली-कुटी छवियों को भी महत्वपूर्ण मानना पड़ेगा। आज हर हाथ में मोबाइल है और हर कोई वीडियो-फिल्म्स देखने का दीवाना है। ऐसे में ये बाजारी विज्ञापन औरतों की गलत छवि पेश करते हैं जिनका हमें संज्ञान लेना ही होगा।  (Painting by Thomas Hammer)

स्वतंत्रता
 दयाल शरण  
 15 August 2018  

देश आज ब्रटिश राज से मुक्ति के 71 वर्ष पूर्ण कर चुका है और हम सभी इसे स्वतंत्रता दिवस के रूप में मना रहे हैं। आप सभी को हार्दिक बधाई।16 अगस्त 1947 से हम कुछ और गुलामी से मुक्ति के लिए संघर्षरत हैं। आज के परिपेक्ष्य में यदि इस दिशा में हुई प्रगति का अवलोकन नहीं होगा तो प्रगति चिन्हित करना बेमानी लगेगा। अंग्रेज गए पर वे विरासत में देश की खस्ता हाल अर्थव्यवस्था छोड़ गए। वे देश विभाजन, संकुचित और आत्म केन्द्रित राजनीति के वे माइन्स छोड़ गए जिनमे अब तक घातक विस्फोट हो रहे हैं। वे फूट डालो और शासन करो के उस राजनैतिक विनाशक सिद्धांत को रोप गए जिससे यदि कुछ मुट्ठी भर लोग थोड़ा विकास कार्य करते भी हैं तो वह भी आज के दृष्टिकोण से गौण बन जाता है।दस साल के लिए जारी आरक्षण की सुविधा चुनाव जिताऊ मन्त्र बन कर आज तक टूल के रूप में उपलब्ध है। जिन लाभार्थियों का जीवन स्तर गुणात्मक रूप से सुधरा भी है वे भी स्वत: इस सुविधा के सतत उपभोग से खुद को अलग नहीं कर पा रहे हैं।अर्थ व्यवस्था का वह पुरसाने हाल है कि एक मध्यम या उच्च वर्गीय कर्मचारी अपने सालाना वेतन के एक से दो माह का वेतन आयकर में चुकाने के बाद भी अनेकों इन डायरेक्ट टैक्स चुका कर देश की अर्थ व्यवस्था पर भार होती तमाम व्यवस्थाओं को पोषित कर रहा है।औद्योगिक विकास का यह आलम है कि 80-90 के दशक में हम जिन कुछ वस्तुओं का उत्पादाब खुद कर लेते थे उत्पादन मूल्य बढ़ने से वे उत्पाद चीन के सस्ते उत्पादों के आगे टिक नहीं पाए और धीरे-धीरे वे इकाइयां बंद हो कर विलुप्त हो गयीं।इतिहास बतलाता है कि अवध पर जब हमला हुआ था तो वहां के सत्ताधीश मनोरंजन में डूबे हुए थे। यह वाकया अपने आप में बहुत बड़ा सामाजिक और राजनैतिक संदेश चेतावनी के रूप में देता है। लोग फेस-बुक और व्हाट्स एप में उलझे रहें या माल्स में फिल्मे और टी वी पर सीरियल देखते रहें किसी एडिक्ट की तरह और समाज तथा देश का धीरे-धीरे पतन और क्षरण होता रहे।ऐसा नहीं है कि देश में विकास कार्य हुआ ही नहीं है, समस्या यह है कि यह कार्य कभी भी भूत काल से सबक सीखकर भविष्य की आवश्यकताओं को दृष्टिगत रखकर नहीं हुआ। सडके बनाने के बाद ध्यान आया कि नाली बनानी थी, सड़क फिर खोद डाली। फिर ध्यान आया कि टेलीफोन के केबल नहीं डल पाए तो उसे भी डालने के लिए सड़क खोद दी। जिन चौराहों पर नेताओं की आदमकद प्रतिमाएं लगायीं थीं उन्हें पुनरुद्धार के नाम पर रंग कर फवारा लगाने के क्रम में बची खुची सड़क फिर खोद दी गयी। फिर सडक रिपेयर की गयी और फिर लगा कि ट्रैफिक बढ़ गयी है तो मैट्रो ट्रेन चला दी जाए। लीजिये फिर नए सिरे से निर्माण को फिर नई दिश मिल गयी। ऐसा नहीं है कि इप्लीमेंटशन टीम को एग्जक्यूशन टीम को इसका पूर्वाभास् नहीं होता पर वे इन सब से बेखबर रहकर सिर्फ दिए गए काम को पूर्ण करने का यत्न करते हैं। एक आयकर दाता की हैसियत से हमे यह पूछने का हक़ है कि इस तरह जनता का गाढी कमाई का पैसा इस तरह लुटाने वाले लोग कहीं किसी भी प्रकार की जवाबदेही लिए नौकरी कर रहे हैं।विकासशील देशों में इन्फ्रास्ट्रक्चर पर लंबे समय तक काम चलता है, लेकिन कितने लंबे समय तक यह भी एक प्रश्न के रूप में उभरा है। एक तरफ हम खुद को विश्वस्तर के देश के रूप में साबित करने पर लगे हैं, कहाँ यह उखड़ी सड़कें और परत पर परत खुलते घोटाले विकास की एक दूसरी कहानी कह रहे हैं।बात हताश होने की होगी क्यूंकि बेतरतीब दौड़कर आप किसी लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकते, लेकिन निराश मत होएं, हर व्यक्ति खुद आत्मावलोकन करे, जाने कि संविधान के अधिकार कर्त्तव्यों के अनुपालन पर ही आपको मिलेंगे। आरक्षण आपकी बैसाखी है, इसे विरासत मत बनने दीजिये। किसी भी योजनाओं पर भविष्य की आवश्यकताओं का आंकलन कर ही परियोजना पर अमल करें और अनावश्यक खुद का और आमजन की मेहनत का पैसा ना खर्च करें ना करने दें। सिर्फ सीमा पे सैनिक खड़े करके या उनका बलिदान करवाके तो आप सीमा पर आक्रमण और अतिक्रमण रोक सकते हैं किन्तु जो देश अपनी तकनीकी क्रान्ति के बल पर आपकी मांग अनुरूप तुलनात्मक रूप से सस्ताक उत्पाद लेकर आपके बाजार में घुसपैठ कर चुके हैं और आपके देश को बेरोजगारी की दोजख में धकेल चुके हैं उनसे उनके स्तर पर लड़ने का समय है। इन सब में एक बात जो कहीं छूटी जा रही थी वह परिवार के लिए वांछित समय निकालने का है। आप जानिये कि तमाम छुट्टियों का प्रावधान होने के बावजूद भी बहुत से नियोक्ता अपने कर्मचारियों का इतना अधिक शोषण करते हैं कि वे उन्हें छुट्टियों में भी काम करने को उद्वेलित करते हैं। जबकि परिवार और समाज के प्रति भी किसी भी व्यक्ति की जिम्मेदारी को नकारा नहीं जा सकता। यह श्रमिकों पर गुलामी के हावी होने का एक और मिश्र रूप है, जो अंग्रेजों के जाने के बाद भी लागू है। कोई भी व्यक्ति कम्प्यूटर की तरह मल्टी टास्किंग नहीं हो सकता। कई सारे काम को इकट्ठा करवाने के दबाव में या तो वह अपना आउट्पुट बिगाड लेता है या सोशल बैक ग्राउण्ड में आउट आफ फोकस हो जाता है। आओ समझिये कि देश का नागरिक देश को अपनी सन्तान के रूप में तभी एक सजग विरासत सौप पायेगा जब उसे अपनी सन्तान के उद्भव और विकास में उसका निर्धारित रोल निभाने दिया जाएगा। जीविका के लिए काम का अपना दायरा है और परिवार के लिए समय देने का अपना महत्त्व है। अगर यहाँ सोशल इंजीनियरिंग फेल हुई तो देश को हम विरासत में एक कुंठित और बिखरा हुआ समाज ही दे पायेंगे जहां पड़ोसी तो दूर बच्चों का अपने माँ-बाप से भी कोई सरोकार नहीं होगा। तब देश का क्या होगा??? भावनात्मकता विहीन समाज की परिकल्पना यदि स्वरूप लेगी तो पाषाण युग की तरफ हमारा गमन सुनिश्चित है।निराश नहीं होना है, देश के भीतर कर्मरत तमाम व्यक्ति खुद अपने आप में एक सैनिक समझे जो सीमा के भीतर फैली कुव्यवस्थाओं के खिलाफ लड़ने वाला समझे। ईमानदारी से देश की प्रजातांत्रिक व्यवस्था को सुघड़ रखे, मतदान का हिस्सा बने, योग्य नेतृत्व का चयन करे और देश को समग्र विकास की दिशा में गतिमान करे।तमाम विकासोन्मुखी, समग्र विकास की संभावनाओं का प्रयोग कर देश आर्थिक गुलामी से उबरे, सोशल इंजीनियरिंग का प्रयोग कर सामजिक समरसता लाये, जात-पात के बंधन से मुक्त हो, शोषक और शोषित की परिभाषाओं को इतिहास बनाए और सीमा पर खडे सैनिकों का आत्मबल बन कर देश को शारीरिक रूप से प्रबल करे, प्रजातांत्रिक मूल्यों की रक्षा करते हुए कुशल और शिक्षित नेतृत् को चुने। पुन:श्च स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक बधाई।

लिल्लीथ की कहानी
 Rajabala Tripathy  
 1 April 2019  

*लिलीथ की कहानी*एक लंबे समय पहले मुझे लिलीथ की इस कहानी को पढ़ने का मौका मिली थी। मेरे लिए वह एकमात्र विद्रोही पौराणिक नारी चरित्र है।.........................................................................पारंपरिक बाइबिल कई धार्मिक फिल्टरों से गुजर चुका है और यह कुछ महत्वपूर्ण वर्गों और टुकड़ों को भी खो दिया है। हालांकि, इसमें एक हिस्सा है जो इसमें छोड़ा गया है जो बताता है कि ईश्वर ने मनुष्य सृष्टिके पहले मुहुर्त में न केवल एक आदमी बल्कि एक महिला को बनाया है। कहा जाता है कि ओ  लिलिथ थी दुनिया की पहली महिला और उसे   भगवान ने उसी मिट्टी से बनाया था जिस मिट्टी से  उसने आदम को बनाया था। ऐसा कहा जाता है कि लिलिथ को तब भगवान ने त्याग दिया और खारिज कर दिया जब यह पाया गया कि वह आदम से मजबूत और अधिक बुद्धिमान है  और वह आदम के आदेशों का पालन नहीं कर रही थी। मानवता की उत्पत्ति को समझने के लिए बाइबिल में इस चरित्र का उल्लेख नहीं किया गया था क्योंकि लिलीथ  चर्च की परंपरा के खिलाफ थी जो कहता है कि महिलाओं को पुरुषों को मानना होगा और उनके स्तिति  पुरुषों की तुलना में कम   होना चाहिए। लिलिथ एक ऐसी महिला थी  जो दृढ़ थी, और वह बुद्धिमान थी और आदम से बेहतर  थी। हालांकि, आदम के चरित्र अधिक प्रभावशाली था। अंतरंगता के समय में, लिलीथ ने मांग कि ओ आदम के ऊपर  हो सकती है, लेकिन आदम ने इनकार कर दिया। ऐसा कहा जाता था कि एहि सुरुवात थी झगड़े का। इसलिए दोनों को अलग किया था और  भगवान द्वारा लिलिथ पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। किताब कहती है, लिलिथ: "मुझे तुम्हारे नीचे क्यों होना  चाहिए?  मुझे भी उसि मिट्टी से बनाया गया है जिस में तुम बने हो,  और इसलिए मैं तुम्हारा बराबर हूं।" पर आदम ने नेहीँ मानी और  जैसे ही  ने उसे आज्ञा मानने के लिए मजबूर करने की कोशिश की, लिलिथ ने गुस्सा किया, भगवान के नाम का उच्चारण किया, और छोड़ कर चालि गयी।  उसके बाद ईस्वर ने इव  को आदम की पसलियों से बनाया  था। लिलीथ की चरित्र को बाइबल से सेंसर किए गया  क्योंकि उसने महिलाओं को सशक्तिकरण के विचार देती है। लेकिन अगर लिलीथ चले गए, तो बड़ा सवाल यह है कि वह कहाँ गई थी? यह कहा गया है कि  कि वह सीधे शैतान की बाहों में भाग गई। लिलीथ पहली महिला थी, इव से पहले, लेकिन वह अधिक बुद्धिमान और विद्रोही थी और मनुष्य की तुलना में एक बेहतर चरित्र थी, इसलिए उसे दंडित किया गया और उसकी गाथा बाइबल से काट दिया गया ।.................................................. ..........................यह लिलीथ की दुखद कहानी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, हम ईव के वंशज है लिलीथ के नहीं । सायेद इस लिए  किसी भी असमानता के खिलाफ हमारी आवाज उठाना इतना  सहज नहीं होता है। एक राशनलिस्ट होने के नाते मैं जीवन की पौराणिक उत्पत्ति में विश्वास नहीं करति हूं, फिर भी यदि मुझे चयन करने को कहा जाए, निश्चित रूप से में अपने  पूर्बज के रूप में  रूप में इव के बजाय लिलीथ का चयन करूंगी।Rajabala

कौमार्य: एक मिथ
 Rajabala Tripathy  
 1 April 2019  

......कौमार्य: virginity........(एक सामाजिक जागरूकता संदेश)हम कल महिलाएं कौमार्य के बारे में चर्चा कर रहे थे और बहुत सारे लोग ये मानते हैं कि कोई लड़की कुंवारी है या नेहीँ ये उस लड़की को अपने पहले सेक्स के दौरान खून निकलता है या नेहीँ, उस से ही पता चलता है। लेकिन यह गलत है .. रक्तस्राव यह निर्धारित नहीं करता कि कोई लड़की कुंवारी है या नहीं, इसलिए मैंने इस लेख को जारी करने का फैसला किया है ताकि लड़कियों के इस मुद्दे पर हमारे युवा पुरुषों और महिलाओं को शिक्षित करने में मदद मिल सके .....क़ौमर्ज्य के बारे में मिथक-ज्यादातर महिलाको अपने पहले सेक्स के दौरान रक्तस्राव  क्यों होती। दक्षिण और मध्य एशिया (पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश, अफगानिस्तान इत्यादि) और अफ्रीका (नाइजीरिया और कई अन्य राष्ट्रों) में एक बहुत ही आम मिथक है की कोई महिला कुंवारी है या नेहीँ पहली सेक्स के दौरान  रक्तस्राव  हुआ कि नेहीँ इस आधार पर आप बता सकते हैं ,  ये बिल्कुल  सत्य नेहीँ है। पहली बार यौन  संबंध बनाने पर सभी महिलाको खून नहीं निकलति। ऐसा क्यों आइये समझते हैं।  यह समझने के लिए कि क्यों कुछ महिलाएं खून बहाती हैं और क्यों कुछ नहीं बहती हैं, यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि हाइमेन क्या है। हाइमेन एक झिल्ली है जो योनि खोलने के हिस्से को कवर करती है (यह हमेशा पूरे योनि को अवरुद्ध या कवर नहीं करती है, क्योंकि कुछ लोग गलती से सोचते हैं)।सभी महिलाओंका एक समान हाइमन नहीं होता है। हाईमेन भी महिला से महिला से अलग होता है - जैसे कि सभी महिलाओं की अलग-अलग ऊंचाई और वजन और फीचर्स होते हैं, सभी महिलाओं के पास अलग-अलग प्रकार के हाइमेन होते हैं। कुछ महिलाओं में मोटी टाइप  होते हैं, कुछ में बहुत पतले टाइप  होते हैं, और कुछ महिलाओं में कोई हाइमेन नहीं होता है। कुछ महिलाओं में बड़े होते हैं, कुछ महिलाओं में स्वाभाविक रूप से बहुत कम मात्रा में हाइमेन होता है जो उनके योनि खोलने के केवल एक छोटे हिस्से को कवर करता है (और इसलिए वास्तव में पहली बार सेक्स के दौरान, रास्ते में नहीं मिलता है)। इसके अलावा, जब आप बड़े होते हैं तो हाइमेन अपने आप नस्ट हो सकता हैं। अधिकांश महिलाओं के लिए, हाइमेन व्यायाम, साइकिल चलाना, घुड़सवारी के साथ अपने आप नस्ट हो सकता हैं - बहुत अधिक शारीरिक गतिविधि, यहां तक कि नाचने के साथ भी नस्ट हो सकते हैं! - या मासिक धर्म के दौरान टैम्पन का उपयोग करने से भी। विशेष रूप से यदि हाइमेन बहुत छोटा या पतला होता है, तो इसमें से अधिकांश एक लड़की के ग्रोथ के साथ साथ में खुद ब खुद नस्ट होने लगती है। अगर एक महिला एक हाइमेन के बिना पैदा होती है, तो वह पहली बार यौन संबंध के समय खून नेहीँ बहती।  अगर एक औरत के पास छोटे या पतले हामेन होते हैं, तो वह भी पहली बार यौन संबंध के टाइम खून नेहीँ बहती है। अगर एक महिला के हाइमेन अपने आप नस्ट हो जाती है  (जो लड़कियां बड़े होने के समान ही आम हैं), तो वह भी नेहीँ । नतीजा यह है कि ब्रिटेन मेडिकल जर्नल द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, कम से कम 63% महिलाएं यौन संबंध के समय खून नेहीँ बहती। जो महिलाएं खून बहती हैं उनमें शामिल हैं: - मोटी भजन वाली महिलाएं (जो आबादी का एक छोटा प्रतिशत बनती हैं) - छोटी लड़कियां। क्योंकि हाइमैन समय के साथ अपने आप नस्ट हो सकते हैं। 16 वर्षीय महिला के पास 25 वर्षीय की तुलना में खून बहने का अधिक मौका होता है। जब तक एक लड़की सहमति की कानूनी आयु से ऊपर या उससे अधिक हो - 18, 20, 24 वर्ष की आयु, उदाहरण के लिए - उसके अधिकांश हाइमेन अपने आप से नस्ट होने  की संभावना है, जिसका अर्थ यह है कि वह  खून बहने की संभाबना कम होता है।  अक्सर, जो महिलाएं खून बहती हैं वे ऐसी महिलाएं होती हैं जिन्हें सेक्स के दौरान दर्द से गुजरना पड़ताहै।  अगर  लड़की के अंदर दर, असहज, उत्तेजित न होना ऐसे हालात होता है  तो  चोट लगने से खून बहने की संभावना है। चूंकि ज्यादातर लोग सोचते हैं कि पहली बार महिलाओं के यौन संबंध होने पर महिलाओं के लिए खून बहना जरूरी है, उन्हें यह नहीं पता कि यह खून किसलिए है,  है कि महिला को चोट लगी है, या  न कि हाइमैन तोड़ने के कारण। ज्यादातर मामलों में चोट ही कारण है।   महिला कौमार्य का आकलन करने का कोई तरीका नहीं है। रक्तस्राव में कौमार्य के साथ कुछ भी संबंध नहीं है -हाइमेन के प्रकार पे डिपेंड करता है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, पहली बार सेक्स के दौरान केवल 37% खून बहती है। यह जानना इतना महत्वपूर्ण क्यों है? दुनिया भर में महिलाएं 'कुंवारी खून बहने की मिथक के कारण दुर्व्यवहार, घायल और यहां तक कि मारे गए .. क्योंकि ज्यादातर लोग (पुरुष और महिलाएं) सोचते हैं कि खून बहना कौमार्य का संकेत है, जो महिलाएं पहली बार खून नहीं बहती वे  तलाक, घरेलू हिंसा और संदेह से पीड़ित होते हैं, और यहां तक कि सम्मान के लिए भी मारे गये है।लोगों को ये शिक्षित करना है  कि लड़की को पहली बार यौन संबंध रखने से  खून बहना जरूरी नेहीँ है  - क्योंकि सभी लड़कियों में मोटी हाइमेन नहीं होते हैं, और कुछ हाइमेन जन्म के बिना पैदा भी होते हैं - यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सचमुच जीवन को बचा सकता है। कृपया समझे और समझाये।Source: Bannu institute of medical sciencesRajabala

नारी
 Anu Jain  
 6 December 2019  

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कैंसर
 Anu Jain  
 16 December 2019  

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नागरिकता (संशोधन) बिल, 2019
 Anu Jain  
 23 December 2019  

नागरिकता (संशोधन) बिल, 2019नागरिकता एक्ट, 1955 यह रेगुलेट करता है कि कौन भारतीय नागरिकता हासिल कर सकता है और किस आधार पर। एक व्यक्ति भारतीय नागरिक बन सकता है, अगर उसने भारत में जन्म लिया हो या उसके माता-पिता भारतीय हों या एक निश्चित अवधि से वह भारत में रह रहा हो, इत्यादि। हालांकि अवैध प्रवासियों द्वारा भारतीय नागरिकता हासिल करना प्रतिबंधित है। एक अवैध प्रवासी वह विदेशी है जो: (i) वैध यात्रा दस्तावेजों, जैसे पासपोर्ट और वीजा के बिना देश में प्रवेश करता है, या (ii) वैध दस्तावेजों के साथ देश में प्रवेश करता है लेकिन अनुमत समयावधि के बाद भी देश में रुका रहता है।[1]अवैध प्रवासियों को विदेशी एक्ट, 1946 और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) एक्ट, 1920 के अंतर्गत कारावास दिया जा सकता है या निर्वासित किया जा सकता है। 1946 और 1920 के एक्ट केंद्र सरकार को भारत में विदेशियों के प्रवेश, निकास और निवास को रेगुलेट करने की शक्ति प्रदान करते हैं। 2015 और 2016 में केंद्र सरकार ने दो अधिसूचनाएं जारी करके अवैध प्रवासियों के कुछ समूहों को 1946 और 1920 के एक्ट्स के प्रावधानों से छूट प्रदान की।[2] ये समूह अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई हैं जिन्होंने भारत में 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले प्रवेश किया है।2 इसका अर्थ यह है कि अवैध प्रवासियों के इन समूहों को वैध दस्तावेजों के बिना भी भारत में रहने पर निर्वासित नहीं किया जाएगा या कारावास नहीं भेजा जाएगा।2016 में नागरिकता एक्ट, 1955 में संशोधन करने के लिए एक बिल पेश किया गया।[3] यह बिल उन्हीं छह धर्मों और तीन देशों के अवैध प्रवासियों को नागरिकता की पात्रता प्रदान करने के लिए संशोधन का प्रस्ताव रखता है। बिल भारत की विदेशी नागरिकता (ओसीआई) वाले कार्डहोल्डरों के पंजीकरण से संबंधित प्रावधानों में भी संशोधन प्रस्तावित करता है। इसे ज्वाइंट पार्लियामेंटरी कमिटी को भेजा गया जिसने 7 जनवरी, 2019 को अपनी रिपोर्ट सौंपी।[4]  8 जनवरी, 2019 को बिल लोकसभा में पारित हो गया।[5]  हालांकि 16वीं लोकसभा के भंग होने के साथ बिल लैप्स हो गया। परिणामस्वरूप दिसंबर, 2019 को लोकसभा में नागरिकता (संशोधन) बिल, 2019 को पेश किया गया।2019 का बिल अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई अवैध प्रवासियों को नागरिकता की पात्रता प्रदान करने का प्रयास करता है। वह पूर्वोत्तर के कुछ क्षेत्रों को इस प्रावधान से छूट देता है। बिल ओसीआई कार्डहोल्डर्स से संबंधित प्रावधानों में भी संशोधन करता है। एक विदेशी 1955 के एक्ट के अंतर्गत ओसीआई के रूप में पंजीकरण करा सकता है, अगर वह भारतीय मूल का है (जैसे भारत के पूर्व नागरिक या उनके वंशज) या भारतीय मूल के किसी व्यक्ति का स्पाउस (पति या पत्नी) है। इससे वे भारत आने और यहां काम करने एवं अध्ययन करने जैसे लाभों को प्राप्त करने के लिए अधिकृत हो जाएंगे। बिल एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव रखता है जिसके अंतर्गत अगर ओसीआई कार्डहोल्डर केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किसी कानून का उल्लंघन करता है तो उसका पंजीकरण रद्द किया जा सकता है।

नकश्लवाद पर डण्डक क्यों
 Rahimkhan mangario  
 5 July 2020  

किसी छोटी सी घटना के बाद हमारे देश की जनता से लेकर नेताओं तक का क्या खून उबलने लगता हैं,आप सब जानते ही होंगें।आप सब जानते ही होंगें कि किसी मंदिर या मस्जिद का मामला हो या बीफ का मामला हो ,गाय का मामला हो,किसी व्यक्ति के अपराध पर हो रही बातें हो,सब में हमारा वीर रस फूट पड़ता हैं,देश भक्ति का नशा रंग दिखाने लगता हैं।कई बार तो फिल्मों की काल्पनीक बातों पर ही हम कितने दूरदर्शी बनकर देश के पहरूवे बनकर खड़े हो जाते हैं।पिछले कुछ वर्षों में देश भक्ति का उपदेश कुछ ज़ादा ही परोसा जा रहा हैं।हमारा मिडिया हो ,नेता हो,समाज सेवी हो,सब को देश भक्ति का पाठ पढाते मैंने देखा है।एक फिल्म के सीन के विरोध में देश को जलते देखा होगा,बीफ के नाम पर या गाय के नाम पर हमारे वीरों को जूझतेे भी देखा होगा,पाकिस्तान का जनाज तो लगभग हर भारतीय हर रोज एक बार निकाल कर ही चैन पाता हैं।कश्मीर का भारत का हिस्सा होते हुए भी हमारा दिल नहीं भरता और हम उसे अखण्ड भारत बनाने की कसमेें खाकर अपना पौरूषत्व दिखाते हैं।कहीं भी हम कम समझदार या कम सूरवीर नहीं दिखते।इतना ही नहीं गाहे वगाहै हम दुनिया को अपनी वीरता व कुटनीति ताकत की दुहाई देते नहीं थकते।सब कुझ है,मुझे भी कहीं शक नहीं ,लेकिन मेरी मोटी अक्ल को एक बात कतई समझ नहीं बैठ रही की जिस देश के अंदर इतना राष्ट्रवाद मौजूद हो,किसी मामूली बात पर आसमान पाताल एक करने वाला जूनून पाया जाता हो,जहां घर घर देश भक्त एक नहीं हजार हो।दुनिया की ताकतों को चीर फाड़ देने की ललकार देने वाले हम जहां हो,उन्हीं के बीच ,देश की धरती पर ही, ऐसा तंत्र मौजूद हो,जिसके पास इतनी ताकत हो कि उसे हमारी इस सारी सूरवीरता की परवाह ही नहीं हो?जी हां हम सब अपनी बाहें चढाकर देश की घरेलू खपत की रोटियां पकाते रहते हैं,और वो सूकमा जैसी वारदातों को बड़े आराम से अंजाम दे देते हैं।बात एक ही घटना की नहीं है,एक घटना तो  चलो मामूली मानी जा सकती हैं,लेकिन सवाल मेरा अलग हैं।हर बात पर हाय तोबा मचाने वाला हमारा वो मानस इस मुद्दे पर इतना खामौस क्यों? सवास इतना ही नहीं हैं,सवाल बहूत कडवा है,समझ मैं नहीं आता कि ये नक्सली जो किसी समुन्द्र पार देश में नहीं रहते, बल्कि हमारे देश में ही रहते हैं,वहीं जहां हम घर घर राष्ट्रभक्त होने का दावा करते हैं।आखिर हम उन्हे कैसे नहीं पहचानते?हां अगर इन नक्सलियों की संख्या कुछ सैकड़ा या हजार हो तो माने कि कहीं छुपे रहते होंगे,लेकिन इनकी तो हथियारबरदारदस्तों की संख्या ही हजारों में है।उनके पास हथियार है राशन है,वाहन है,संचार साधन हैै,टैक्नोलोजी है,ये सब कहां से आता है,इलजाम भी किस पर दे? यह सब कुछ हम सब जानते हैं।लेकिन किसी का वीर पौरूषत्व नहीं जागता,किसी को कोई आंदोलन चलाने  की फुरसत नहीं,कहीं पर विरोध प्रदर्शन वगैरा की जरूरत नहीं!सड़कों पर देशभक्त जो तांडव दिखाते हैं वे भी खामौस!जो काबूल पार के तालेबान,दजला पार की आईसिस  के खतरे को तुरन्त भांप कर देश में असुरक्षा माहोल पैदा करते नहीं थकते,उनको अपने आस्तीन का सांप क्यों दिखाई नहीं देता?                            चलो कुछ बात मैं भी कह दूं ,जहां तक मैं जानता हूं इन नक्सलियों का अपना भी एक राष्ट्र वाद हैं,येे भी अपने को राष्ट्र के लिए समर्पित मानते हैं ,ये भी अपना संघर्ष राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर कर रहे हैं।और जब एक देश के अंदर ही राष्ट्र वाद का आंदोलन विकसित हो गया हो,और हमारे सैन्य दलों को ललकार रहा हो और हम गाय के नाम पर या मंदिर या मस्जिद के नाम पर या अपने धार्मिक सिद्धातों के परचार परसार पर या अपने राजनैतिक स्वार्थों के लिए संघर्ष कर रहे हों,तो यह मान कर चलो की हमारी राष्ट्भक्ति खोखली है और उन नक्सलियों की राष्ट्भक्ति पक्की है,और हमारी हार पक्की!                      याद रखना मेरे देशवासियों दुनिया में वतन परस्तो के दीवाने पन की कई मिसाले मौजूद है,उनका जजबा,हुबवल वतनी,उनकी जांबाजी एसी नहीं होती जैसी आजकल हमारे देश में उन लोगों की दिखाई देती है जो भारत माता की जय जय कह कर अपने आप को वीर सपूत कहते हैं।वे लोग कायर ही नहीं बल्कि मौका परस्त व स्वार्थी हैं जो देेश में घरेलू खपत के लिए देश भक्ति का चोला ओढ़े रहते हैं,लेकिन देश के अंदर इतने बड़े खतरे को नजर अंदाज कर रहे हैं।नक्सलियों से निपना सिर्फ हमारी फौज का ही काम नहीं है। क्या हमारा समाज व जनमानस इस खतरे को समझता हैं? क्या हम हर नक्सली को नफरत से देखते है?कहीं न कहीं हम इन का सहयोग तो नहीं कर रहे?क्या इन सब बातों का सऊर हम देश में फैला रहे है?जहां तक मैं जानता हूं,ऐसा नहीं हैं,सब के लिए यह हल्का मामला हैं।सबके अपने अलग देश भक्ति के मायने है,सब अपने मायने में लगेे है,नक्सली तो सिर्फ सैनिकों के हिस्से की समस्या है!जब देश में ऐसी ताकते पनप चुकी हो और हम घरेलू खपत की राजनिति मैं अपना गौरव खोज रहे हों,मैं समझता हूं हम बहूत गलत राह पर हैं,हमारा भविष्य असुरक्षित नजर आता हैं। हम अपनी मिथ्या गौरव गाथा गढ़ कर अपना मन बहला रहे है और देश अंदर दूसरा देश पैदा हो रहा है।जहां हम चार कोडी के लिए लोगों पर तुष्टीकरण का रोना रोते है वहीं देश की सुरक्षा जैसे मामले के तुष्टीकरण को नजरअंदाज कर रहे हैं जो कि घातक होगा।

विरोध क्यों
 Rahimkhan mangario  
 5 July 2020  

यह बहस तवील अरसे से चल रही है कि मुसलमानों को राष्ट्र गीत व राष्ट्र गान  गान चाहिए या नहीं ¦शिक्षा जगत से जुड़े लोगों के लिए व विधार्थियों के लिए यह बहस और भी अधिक पसोपेश की वजह बनती है और इसी का फायदा  कई बार  असामाजिक तत्व उठाते हैं.अपनी बात को अागे बढाता हूं_एक नागरिक के लिए यह राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत या राष्ट्र ध्वज होते क्या हैं?अगर साफ जहनियत से गौर किया जाए तो यह साबित होता है कि ये राष्ट्रीय प्रतीक हैं जिनको किन्हीं विशेष उद्देश्यों के लिए स्थापित किया गया है.और हम सब जानते हैं कि ये उद्देश्य क्या हैं, ये उदेश्य हैं देश प्रेम, राष्ट्रीय एकता,  अखण्डता, को कायम करना.अब बात आती है इन प्रतीकों के अर्थ और इतिहास की. क्या इनका अर्थ व इतिहास इतना महत्वपूर्ण है कि उसपे बहस की जाय.हमारे लिए इनका अर्थ व इतिहास महत्वपूर्ण नहीं बल्कि महत्वपूर्ण यह हैं कि ये किसके प्रतीक हैं, ये किन उदेश्यों के लिए स्थगित किये गये हैं, अगर उदेश्यों से हमें कोई तकलीफ नहीं हैं तो हमें विरोध नहीं करना चाहिए.इस बात के पक्ष में मैं तर्क देना चाहूंगा, हम सब जानते हैं कि राष्ट्र गान टैगोर साहब जब लिख रहे थे तब उनका सम्बोधन 1911का दिल्ली दरबार था, यानी इस रचना में उन्होंने ब्रिटिश राज  का गुणगान किया हैं, यह एक विवादित बात हैै ,अब सवाल यह है कि क्या हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने हमें ब्रिटिश राज के गुणगान के लिए यह गाना दिया है. बिलकुल ऐसा नहीं है. देश के लिए यह रचना एक प्रतीक के रूप में अपनाई गई है और वह है राष्ट्र प्रेम और राष्ट्रीय सौन्दर्य.इसी तरह से हम राष्ट्र गीत व राष्ट्र ध्वज के इतिहास व अर्थ के विरोधाभास को महत्व न दे कर हमें महत्व इस बात को देना चाहिए कि ये प्रतीक किन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए स्थापित किये गये हैं.अब बात करते हैं इस्लामी नजरिए की, सबसे पहला विरोध यह कह कर किया जाता हैं कि इस्लाम सिवाय अल्लाह के आराधना की इजाजत नहीं देता. अगर एक बन्दा सीधा खड़ा हो कर जन गण मन या वन्देमातरम गाता है, पास में इमारत पर तिरंगा लहरा रहा हो, गाने व सुनने वालों के दिलोदिमाग में देश प्रेम की भावना हो, तो बताओ किस की आराधना हो रही है?  हां अगर आपके दिमाग में 1911 का दिल्ली दरबार या आनन्द मठ की कहानी घूमने लगे तो ये आपके मन का फितूर है.क्योंकि आप से राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत गवाकर यह कोई अपेक्षा नहीं करता कि आप मे इस के अर्थ या इतिहास का प्रचार किया जाए बल्कि अपेक्षा यह की जाती हैं कि हम सब देश प्रेम के लिए सुर में सुर मिला कर एकता व राष्ट्र भक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं.अब कुछ बात व्यवहारिकता की करते हैं, एक आम आदमी अपनी दिनचर्या में अपने धार्मिक सिद्धांतों का पालन कितना करता है? एक आम मुसलमान अपने इस्लामी कानून का कितना पालन करता है?क्या यह सही नहीं है कि एक मुसलमान अपनी सहूलियत के लिए कई सिद्धांतों के साथ समझौता कर लेता है?कुछ नमूने ले लें, नबी ए करीम की कई हदिशे हैं और कुरआन मज्जिद में भी हवाले हैं कि_ ऐ मुसलमानों एसे अकड़ कर मत चलो कि दूसरे परेशान हो_अपनी दौलत का दिखावा मत करो कि गरीब को परेशानी हो_रास्ते में एसे ना चलो कि मुशाफिरों को तकलीफ हो.अब बताइए कि गरीबों के लिहाज से कितने मुस्लिम अपनी शानदार गाड़ियों को तर्क कर पैदल चलते हैं. कितने मुस्लिम नेता मुसाफिरों की तकलीफ को देखकर लालबत्ती को अपनी गाड़ी से हटाते हैं.एक और नमुना, क्या अपने घरों, गाड़ियों वगैरह को राजनीति पार्टियों के झण्डों से सजाना शरियत से ठीक है?  इस्लाम हमें इसकी इजाजत नहीं देता. क्या किसी मुस्लिम नेता ने इसका विरोध किया?ये सब वही बातें हैं जहाँ हमने अपने सिद्धांतों से समझौता कर लिया, जो कि समय और परिस्थितियों के लिए जरूरी भी है.इसी तरह हमें राष्ट्र की खातिर राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत के मामले में भी समझोता करने की बात को अपनाना चाहिए.एक बात और भी, क्या हम अपने पर आरोपों के कोलाहल को सुन कर ही विरोध की राह तो नहीं ले रहे? ध्यान रखें विरोधी का काम भटकाना होता है, और आम मुसलमान के साथ यही हो रहा है.मैं हर मुसलमान को यह संदेश देना चाहता हूँ कि वक्त की नजाकत को देखते हुए यह बात समझें कि हमारे लिए यह कोई मुद्दा नहीं है कि राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत गाने से हम कोई बड़ा गैर इस्लामी या गैर अवलाकी अमल कर रहे हैं.बल्कि हमारे लिए यह जरूरी है कि हम बेवजह मुस्लिम विरोधियों को मौका न फरहाम करें जिससे कि हमको मुख्य धारा से बाहर करने के प्रयास सफल हो.