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Category : Reviews
पद्मावत या पद्मावती
 Asha Pandey 'Taslim'  
 29 January 2018  

काकी हमारी क़माल की किस्सागो थी,जब भी कोई कहानी सुनाती आँखों में दृश्य कोंध जाते थे और हम बच्चे अवधी में देश और दुनिया के तमाम किस्से सुनते नहीं थे काकी के आँखों से देखते थे।बचपन में काकी के ही शब्दों में देखा था महारानी पद्मावती का जौहर,गोरा और बादल के शौर्य की गाथा,सिंघल की राजकुमारी का अद्भुत रूप,महारानी नागमती का अपने पति के लिए किया गया त्याग,वो कम्बख्त तोता "हीरामन" जिसने रूप का वर्णन ऐसा किया पद्मावती के कि जिसने सुना मोहित हो गया।शर्मसार एक ब्राह्मण के कृत्य पर भी उन्हीं शब्दों के चित्र पर हुए।और अंत ये सुन के "अय बिटिया" अतिका कौनो भला न,न रूप न ख़िलजी के ताकत न,न राणा के प्रेम,न ज़िद".....ये थी महारानी "पद्मावती" जी शताब्दियों बाद भी जायसी के ग्रंथ से निकल कर हमारे तक आई थी।पिछले कुछ महीनों से अचानक से "पद्मावती" फ़िर चर्चा में आई(वैसे उन्हें भूला कौन था?)संजय लीला भंसाली जब शूटिंग करने चले इसी नाम की फ़िल्म का तब। संजय की बनाई फ़िल्मों के कभी बड़े दिवाने होते थे हम। तब,जब वो 'हम दिल दे चुके सनम' या 'ख़ामोशी' बनाये थे।तब भव्य सेट,उम्दा कलाकार,बेहतरीन संगीत,एक अलग दुनिया में पहुँचता हुआ सा जादूगर थे तबतक,संजय 'गुज़ारिश' तक में।लेकिन जब उन्होंने 'देवदास' को कृत्रिम रूप से भव्य बना दिया दृश्यों को बदलकर कहानी को ही ड्रामेटिक करने के चक्कर में,उस वक्त़ लगा ये चितेरा बहुत जिद्दी है।हर रूप को भव्य दिखाने को आतुर।बाजीराव मस्तानी देखी,फ़िर बाजीराव बदले से लगे। एकदम फ़िल्मी उस वक्त़ निर्णय लिया कि इस आदमी की बनाई फ़िल्में देखनी हो तो,इसकी ही आँखों से देखनी होगी इसलिए ऐतिहासिक फ़िल्में अब न देखनी कमसे कम इनकी बनाई हुई।इस इरादे को मज़बूत ही रखती अगर फ़िल्म को लेकर इतना बवाल न मचता,इस फ़िल्म को देखने का मक़सद साफ़ था अपने-अपने तईं अभिव्यक्ति की आज़ादी को बचाना किसी भी तालिबानी फ़रमान से,बाकी तो पता था जिद्दी भंसाली भी है।नाम और कुछ दृश्य को छोड़ पूरी कहानी खुद लिखेंगे,तो कल दो ज़िद्दी टकराये एक साथ। एक जिसे बदलाव ज़रा पसन्द नहीं,कुछ कहानियों किरदारों में।और दूसरा जो मनमर्ज़ी करता है हर कहानी और किरदारों के संग।भंसाली की पद्मावत(पद्मावती)बहुत खूबसूरत है,वाकई जब जंगल में दीपिका नज़र आती हैं हिरन का शिकार करते उस वक़्त उस सादगी,उस खूबसूरती का कौन न शिकार हो जाये।सिंघल के मोती सी नायाब नायिका हल्के रंग के जोड़े में खुद मोती लगती हैं।"शाहिद" जाने क्यों शाहिद ही नज़र आते हैं,शायद शब्दों में और फ़िल्मों में राजपूत राणा हमेशा लम्बे-ऊंचे आन-बान के साथ इसी रूप में मन के कोने बसे हैं इसलिए।हाँ एक सम्मानित प्रेमी एक निष्ठ राजा के रोल में बुरे नहीं शाहिद,लेकिन "शाहिद" शाहिद ही रहे।दीपिका पहले दृश्य से ही राजकुमारी रहीं,जो जब चलती हैं मुस्कुराती हैं छत्राणी के तरह घाव ताज़ा कर अनूठे ढंग से प्रेम निवेदन करती हैं।मारवाड़ की महारानी बनते ही उस राजकुमारी के पहनावे और ज़बान तक पर असर हुआ और वो भी क़माल के दृश्य हैं।मुझे फ़िल्म में "रणवीर" बस एक बार रणवीर नज़र आये जब वो "खलिबली"गाने पर नाच रहे थे।वीभत्स रस प्रेम के नग़मे गाते हुए।बाक़ी पूरे फ़िल्म में इस लड़के को ढूंढती रही लेकिन वो न था,हाँ इतिहास में दर्ज़ एक क्रूर शासक 'ख़िलजी' को और भी क्रूर रूप में दर्शाता हुआ,अलाऊद्दीन था ज़रूर।जिसे क्रूर दिखाने के सारे हथकंडे अपनाये गए थे। जो जीत कर भी सिकन्दर न बन सका,पदमावती के चिता के,राख़ के नीचे उसकी सारी हेकड़ी दब गई।ये वो दृश्य जो अच्छे लगे।जो देख दुःख हुआ वो एक राजपुरोहित के रूप में एक ब्राह्मण का द्रोह,अपमान के आग में जल कर पूरे मेवाड़ को भष्म करने की कुटील चेस्टा।ख़ुसरो का छोटा सा रोल जिसमें अजीब तरह से डायलॉग डिलवरी और चाटूकारिता की गंध।गोरा,बादल के अद्भुत शौर्य को कम-से-कम फिल्माना।महारानी नागमती जैसी विदुषी को बस गहने के लिए रूठते और सौतन से डाह करते दिखाना।बा-कमाल दृश्य जब महारानी पद्मावती पूरे रनिवास संग जोहर करती हैं उस लाल चुनर को देख उस दृश्य को देख,उस पल में चले जाना जैसा जब ये आत्महत्या नहीं गर्व और वीरता की निशानी थी।सती होना,दुश्मन के हाथ आने से बेहतर अग्नि में समा जाना।एक पल को लगा जैसे वाघा बॉर्डर पर देशप्रेम हिलोरें मारता वहां के वायु में कुछ है।उसी तरह फ़िल्म के अंतिम द्दृश्य क़माल के।पूरी फिल्म देखने के बाद सोचा क्यों मचा बवाल इस फ़िल्म में ?इतनी महिमामंडन तो आल्हा गाते हुए नहीं सुनी राजपूताना शान की।जितनी इस फ़िल्म में हुई है।"ख़िलजी" को आतताई दिखाने की भी भरपूर कोशिश तो की ही गई है।जब वो अपनी ही हथेली काट अपने चेहरे पर खून पोत कर युद्ध की घोषणा करता है।जब वो पीठ पर वार करता है,जब उसके बाये गाल पर आँखों के नीचे आये चोटों को बार-बार फोकस करके दिखाया जाता है।फिर खुद को समझाया शायद ज़रूरी था ये विरोध का ड्रामा भी।न तो, मैं ही न आती,"पद्मावत" देखने।और मेरे जैसे जाने कितने जिन्होंने सुनी हो जायसी के शब्दों से निकली पद्मावती को या महसूस किया हो सती माता के तेज को मेवाड़ में।लेकिन हमसब गये देखा और एक फ़िल्म जिसे बेहतरीन तरीके से बनाया है इस किस्सागो ने,जिनका नाम संजय लीला भंसाली है।*मेरी काकी से बेहतर नहीं है किस्सागोई में यह फिल्म।मेरे ज़ेहन में आज भी वो पद्मावती है जो काकी की ज़बानी दिखी वो आज भी सुरक्षित है।*

Book Review-Mission NPA
 Ravi Yadav  
 22 May 2018  

आदरणीय श्री रमेश यादव जी का ये पहला कहानी संग्रह जब पहली बार हाथ में आया तो लगा कि ज़रूर कोई सेना का या किसी जुनूनी युवा दल का कोई मिशन होगा,जिसका नाम होगा ‘एन.पी.ए.’ किन्तु शुरुआत में ही समझ आ गया कि ये कुछ अलग तरह का मिशन है. एक ऐसा मिशन जो पाठकों को ऐसे जगत के भावनात्मक सफ़र पर लेकर जाता है, जिससे हर आम और ख़ास आदमी का वास्ता तो रोज़ पड़ता है लेकिन सिर्फ ऊपर-ऊपर से, यानी बैंकिंग जगत. डेस्क के इस पार खड़े हम, और डेस्क के उस पार के लोग...चेहरे पर मुस्कान और जुबान में मिश्री घोले सलीकेदार कपडे पहने हुए लोगों को हम समझ ही कितना पाते हैं कि उनका अंतर्जगत कैसा होता है, उनकी मुश्किलें, उनकी भावनाएं उनकी पीड़ाएं और मुस्कुराहटों के रंग हमसे कितने भिन्न हैं ? साहित्यकारों ने काफी अलग-अलग विषयों पर लिखा है किन्तु बैंकिंग जगत पर नहीं के बराबर लिखा गया है, ऐसा मेरा मानना है.      ‘ मिशन एन.पी.ए.’ की अधिकतर कहानियाँ उसी जगत से जुडी हुई हैं. कभी डेस्क के इस पार के मनोभावों को, तो कभी डेस्क के उस पार के मनोभावों को कागज़ पर बड़ी साफगोई के साथ उकेरा है. रमेश यादव जी की पहले भी मैंने एक दो कहानियाँ जैसे “राजू इंजिनियर” और “खेल बनाम साहित्य” हंस पत्रिका में पढ़ी ज़रूर थीं, लेकिन मैं उन्हें मूलरूप से एक स्थापित अनुवादक, कुशल बाल साहित्यकार, लोक साहित्यकार, कलाकार और एक जागरूक पत्रकार के तौर पर ही जानता था. मगर इस संकलन को पढ़ते हुए मुझे बार- बार ये महसूस हुआ कि वो एक बहुत ही मझे हुए और संवेदनशील कहानीकार भी हैं. कहानियों के बीच में उनके द्वारा दिए गए बिंब आपके मन में एक तस्वीर बनाने में कामयाब होते हैं और रमेश जी कहानी को आगे बढ़ाने के साथ-साथ बीच में कहानी के किसी नुक्कड़ पर दो पल रूककर जो आस -पास के माहौल या मन अम्बर पर हवाओं की तरह उठती गिरती भावनाओं का विवरण करते हैं वो आपको एहसास कराता है कि आप हर उस मोड़ पर स्वयं खड़े हैं, जहाँ ये कहानी करवटें ले रही है. जैसे- “ट्रेन देश के दक्षिणी क्षेत्र को पार करके उत्तरी क्षेत्र के सीमा में प्रवेश कर गयी थी, ताप के दिन, जलती दोपहरी, झुलसते सपने, प्लेटफोर्म पर आते जाते लोगों को मैं निहारने लगा. कुछ देर तक मौन होकर सब कुछ देखता रहा. सामने से चाय वाला आ रहा था उसे बुलाया और चाय की चुस्कियां लेते हुए अपनी सीट पर जाकर बैठ गया. सीटी बजी और लहराती हुई ट्रेन चल पड़ी” इत्यादि. मिशन एन.पी.ए. कहानी की ये शुरूआती पंक्तियाँ ही पूरा दृश्य खींच देती हैं. इसी तरह “राजू इंजिनियर” कहानी पढ़ते हुए हनुमान गली की गुमटी से लेकर, बैंक के अन्दर मिन्नतें करता, फूट- फूट कर रोता राजू और साहब वेणुगोपाल के हाव-भाव सब कुछ आपको अपनी आँखों के सामने घटता दिखाई देता है, मानो कोई चलचित्र चल रहा हो. “ राजू का धैर्य टूट गया, वहीं बैंक में सबके सामने रो पड़ा. उसकी चीख़ कातर थी. हाथ जोड़कर वो कह रहा था “साहब मेरी मदद कर दें...मैं बर्बाद हो जाऊंगा.. आप लोगों के भरोसे पर मैं इतने दिनों तक इंतज़ार करता रहा..मेरा बयाना डूब जायेगा सर... मैं सड़क पर आ जाऊंगा... अगर कहें तो मैं फर्जी पेपर भी बनवा लूँगा...आप लोगों को पार्टी भी दूंगा...मुझ पर रहम करें सर...”       अक्सर ये होता है कि हम जो पक्ष होते हैं उस पक्ष को सही साबित करने की कोशिश करते हैं और ये जताने की कोशिश करते हैं कि दूसरा पक्ष हमें समझ नहीं पा रहा, मगर रमेश जी ने खुद बैंकिंग प्रणाली का हिस्सा होते हुए बैंक के कर्मचारियों की मुश्किलों, मजबूरियों, अच्छाईयों के साथ-साथ बैंक में व्याप्त अव्यवस्था, अफसरशाही और ख़ामियों को भी बेबाकी और बिना किसी भेदभाव के साथ लिखा है. इन कहानियों की यही सच्ची पहचान है. साथ ही बैंक के ग्राहकों की सोच को भो बहुत ही इमानदारी से उकेरा है. जैसे शिवा फ्रूटवाला में एक तरफ बैंक मैनेजर शर्मा जी के चरित्र का मानवीय पहलू सामने आता है कि किस तरह वो एक छोटे मोटे धंधे वाले को सलाह और लोन देकर व्यापार का रास्ता दिखाते हैं तो दूसरी तरफ़ एक आम ग्राहक शिवा के चरित्र का सकारात्मक रूप दिखाई देता है कि वो जीवनभर उस एहसान के प्रति अपना सम्मान ज़ाहिर करने के लिए शर्मा जी को तलशता रहता है. रमेश जी ने बहुत ही करीने से कहानी के कैनवास पर भावनाओं के रंगों को बिखेरा है. बैंकिंग प्राणली के दायरों से बाहर निकल कर बीच में वो  “फैसला ज़िन्दगी का” और “सिक्के का दूसरा पहलू” जैसी प्यारी-सी कहानी भी लिखते हैं और फिर लौट कर “पानी रे पानी” और “ नई शाखा का उद्घाटन” में व्यंग्यात्मक शैली का प्रदर्शन करते हैं. “फैसला ज़िन्दगी का” आधुनिक परिवेश की बड़ी ही बेहतरीन कहानी है और युवा पीढी को एक नई सोच देती है. ‘ बिल्ला नम्बर 64 ’ भी लाइव घटना पर आधारित एक बेहतरीन कहानी है जो रोंगटे खड़ी कर देती है. इसी तरह पारिवारीक जीवन के ताने–बाने को बुनती ‘ एक ही थैले में आंसू और मुस्कान, ‘दादाजी’, ‘मुक्ति’ जैसी कहानियां संवेदनात्मक संदेश देती हैं. बदलते समय काल और परिवेश पर आधारित ये कहानियां मन को झकझोर कर रख देती हैं. इस दौर में डॉक्टरी पेशे और निजी अस्पतालों के लूट की पोल खोलती ‘मुक्ति’ कहानी पाठकों की आंखें खोलती हैं. खैर सभी कहानियों पर विस्तार से भाष्य करना संभव नहीं है, अत: आप सभी सुधी पाठक गण स्वयं इनसे रूबरू हों और अपनी कसौटी पर इन्हें परखें.      पत्रकारिता, अनुवाद और बाल साहित्य रचते- रचते अचानक कहानी संग्रह का प्रकाशन और पूरे संग्रह को एक से एक बेहतर ढांचे में ढालना उन्हें करीने से सजाना वाकई एक सराहनीय और स्वागत योग्य कदम है. मैं बैंक बहुत बार गया हूँ लेकिन हमेशा अपना नज़रिया ओढ़ कर, लेकिन इस कहानी संग्रह को पढने के बाद मैं इस बार जब बैंक जाऊंगा तो डेस्क के उस पार को भी रमेश यादव जी के नज़रिए से देखूँगा. श्री रमेश यादव को ‘ मिशन एन.पी.ए.’ के इस सफल मिशन के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं और एक बेहतरीन कहानी संग्रह के प्रकाशन के साथ साहित्य जगत में बहुत कम समय में अपनी सशक्त पहचान बना चुके स्टोरी मिरर को भी साधुवाद. रवि यादव, मुंबई.  ( चर्चित कवि, अभिनेता, प्रोड्यूसर )  

Book Review-Mission NPA
 Rita Shukla  
 23 May 2018  

मानवीय संवेदनाओं के नवीन आयाम का बोध कराती कहानियां ।रमेश यादव जी एक सिद्धहस्त कथाकार हैं। उनके नवीनतम कथासंकलन ‘ मिशन एन.पी.ए.’ में मानवीय संवेदनाओं के नवीन आयाम का बोध होता है। जमीन से जुड़ी इन रचनाओं में कथ्य और शिल्प दोनों का सुंदर विन्यास देखा जा सकता है। बैंकिंग जगत और जीवन से जुड़ी ये कहानियां हिन्दी साहित्य जगत के लिए एक अनूठा प्रयास है जो काउंटर के इस पार और काउंटर के उस पार की दास्तां को बयां करती हैं। ऐसे कई प्रसंग इन कहानियों के माध्यम से प्रस्तुत होते हैं जो इंसानियत के रंगों में सराबोर होते हुए उखड़ने और उजड़ने की जद्दोजहद से गुजरती हैं। इस संग्रह की सभी कहानियां अलग–अलग परिवेश से गुजरती हुई कई नई चीजों का बोध कराती हैं और हमें यह सोचने पर मज़बूर करती हैं कि जिस व्यवस्था से लगभग हम रोज रूबरू होते हैं क्या उसकी ज़मीनी सच्चाई और हकीकत को हम जानते हैं या हम इसे जानने के लिए कितनी कोशिश करते हैं ? अनुज रमेश की हिंदी साहित्य में पैठ महज संयोग मात्र नहीं है। उन्होंने अपने दैनंदिन जीवन के अनुभवों को कलम की नोंक पर सहेजने की साधना की है। उनकी प्रत्येक कहानी मानवीय मूल्यों का दस्तावेज कही जा सकती है। एक मौलिक रचनाकार होने के नाते इंसानियत के दर्द को चेतना की अतल गहराई से समाज तक पहुँचाना उन्का मकसद है। इस पुस्तक के लोकार्पण समारोह को और इसके लोकप्रिय होने के लिए मैं अपनी समस्त शुभाशंसाएं देती हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि वे इसी प्रकार सृजन धर्म में जुटे रहे और शतायु हों।डॉ. ऋता शुक्ल. ( वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित साहित्यकार, कहानीकार – रांची )कहानी संग्रह– ‘ मिशन एन.पी.ए.’– कहानीकार– रमेश यादव, प्रकाशक– स्टोरी मिरर 

Book Review- Mission NPA
 Harish Naval  
 23 May 2018  

मिशन NPA यह शीर्षक है प्रखर कथाकार रमेश यादव के ताज़ा तारीं कहानी संकलन का ।किसी भी देश का तंत्र उसके अर्थ तन्त्र पर आधारित होता है ।अर्थ को विषय बना कर बहुत कम लिखा गया है ।रमेश यादव ने अपने बैंकिंग दीर्घ अनुभव और चिंतन के बल पर यह महत्वपूर्ण संकलन रचा है । इसमें सोलह कहानियाँ हैं जो अर्थ की सोलह कलाओं से समृद्ध हैं ।एन पी ए अब पहचाना बोध है ।ऋण न उतारे जाने और वसूल न हो सकने पर नान पर्फ़ोर्मिंग ऐसेट यानी एन पी ए घोषित होता है और......इसका लाभ (या कहें दुरुपयोग )लिया जाता है...अमरीका में इसकी वजह से कई बैंक अचेत हो गए थे...और उसकी अर्थ व्यवस्था डगमगा गई थी जिसे किसी भाँति ओबामा ने उभारा...भारत के तथाकथित कई बड़े आदमी ऋण लेकर चुकाते नहीं और अर्थव्यवस्था को पंगु किए रहते हैं ....ये कहानियाँ विरल कहानियाँ हैं ।इनमे बड़ी व्यंजक स्थितियाँ हैं...कथाकार ने सार्थक शब्द प्रयोग और ध्वनित अर्थ के बल पर इनकी सहित्यिकता क़ायम रखी है ।बैंक कर्मियों के जीवन के ख़ाकों को रमेश यादव ने बहुत सशक्त ढंग से उकेरा है ...हम सब बैंक जाते हैं किंतु उसके भीतर की संवेदनाओं स्थितियों को भाँप नहीं पाते ...कहानीकार ने हमें बैंक जगत के बाशिंदों से वास्तविक परिचय कराया है ।मैं अभिनंदन करता हूँ ऐसे मेधावी कहानीकार का जिसने हिंदी कहानी में एक नया आयाम जागृत किया ।                         डॉक्टर हरीश नवल              सम्पादक ‘गगनांचल’ नई दिल्ली 

चारूरत्न -स्त्री संघर्ष
 Yash Yadav  
 8 March 2019  

अगर एक सोने की अंगूठी बोल सकती और अपनी कहानी उन दिनों से शुरू करती जब वो mine के अंदर छुपी थी तो शायद कुछ ऐसी ही कहानी बनती - तप कर कुंदन बनने की। इस उपन्यास की नायिका भी अपने उम्र का 35 साल गुज़ार देने के बाद अपने नाम को सार्थक करती हुई कुंदन बनती है।******मेट्रो सिटी में फ्लैट, अच्छे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते दो प्यारे बच्चे, अच्छी पैकेज वाले जॉब में पति और इन सब का यानि फ्लैट, बच्चों और पति का ख्याल रखती पढ़ी लिखी गृहणी जो अपने उम्र के mid 30s में हो।इस scene से काफी लोग परिचित होंगे या relate कर पाएंगे।गृहणी को थोड़ा और describe करते हैं -एक ऐसे ग्रामीण परिवार में जन्म जहाँ खेत भी हो और गृह स्वामी की नौकरी भी। घर के लोग साक्षर/पढ़े लिखे हों। माइंडसेट वही टिपिकल ग्रामीण मिडिल क्लास जहाँ बेटे को नौकरी पाने के उद्देश्य से पढ़ाया जाता है और बेटी को बस उतना ही जितने में ब्याह हो जाये। शादी के पहले से लेकर बाद तक, घर की इज़्ज़त की जिम्मेदारी लड़की के कंधे पर। इज़्ज़त भी इतनी fragile की बस एक लड़के से बात करने या लड़का कहीं रोक कर जबरदस्ती प्रेम पत्र भी पकड़ा दे तो इज़्ज़त पर एक दाग।Globalisation और आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में ऐसी ढेर सारी लड़कियाँ गाँव से शहर / मेट्रो सिटी में आ गई हैं।इस उपन्यास की नायिका भी एक ऐसी ही 35 साल की महिला है। सबकुछ होते हुए भी जिस परिवेश में वो पली-बढ़ी होती है और जिन मान्यताओं के बीच वो बड़ी होती है, वो उसके अंदर कहीं न कहीं एक हीन भावना भी भर देती है। इन्हें जरुरत होती है एक ऐसे व्यक्ति की , चाहे वो सहेली, दोस्त, पति कोई भी हो, जो encourage कर सके .... कह सके कि yes, you can do !ये नायिका भी ऐसी ही कमजोरी के क्षण में एक सहारा पाकर अपने जीवन की कहानी लिखने का निश्चय करती है।अब इनकी कहानी के साथ आप उसके बचपन से लेकर अबतक की यात्रा के साथी बनते हैं। इसकी नज़र से इसके आसपास और घर-परिवार के लोगों को देखते हैं। नायिका की सबसे बड़ी खासियत ये है कि ये कभी भी दोषारोपण करते हुए नहीं दिखती कि फलाने के कारण ऐसा हुआ या ऐसा हुआ होते तो वैसा होता। ये आपको हर पात्र के अंदर ले जाती है, आपको दिखाती है कि फलाने के ऐसे नेचर/सोच के पीछे कारण क्या था।नायिका कुंदन अपनी कहानी के साथ अपनी माँ सुधा की कहानी या यूँ कहें कि उनके जीवन की खिड़की भी हमारे लिए खोलती है। उसकी माँ का जीवन कई अर्थों में नायिका से विपरीत रहा है। मेट्रो सिटी में पली लड़की गाँव में ब्याह दी जाती है क्योंकि लड़के की सरकारी नौकरी है। अब इस महिला को गाँव के माहौल और ग्रामीण महिलाना पॉलिटिक्स में सेटल करना है।तो हम दो विपरीत परिस्थितियों के अंदरुनी संघर्ष को देखते हैं जो कि विपरीत होते हुए भी कई मायने में सामान है।****कुंदन की माँ जब ये सोचती है -"कुंदन तो बच्ची है, लेकिन जब उसके व्यवहार और उसके कम बोलने का मज़ाक उड़ा-उड़ाकर, मेरे सामने हँसा जाता है तो मैं एक ही दिन में उसे सबकुछ सिखाने के लिए मज़बूर हो जाती हूँ चाहे उसके लिए मुझे हाथ ही क्यों न उठाना पड़े।"तब आप कुंदन के प्रति उनके व्यवहार को समझ पाते हैं।और कुंदन भी माँ के दर्द को समझती है जब उसकी माँ बच्चों को अपने सरकारी नौकरी का ऑफर लैटर दिखाकर कहती है कि मैंने घर-परिवार के लिए जॉब नहीं किया।शादी के तुरंत बाद जॉब न कर रही लड़कियों की स्थिति अजीब हो जाती है। माँ-बाप से पैसे ले नहीं सकते क्योंकि वे पराये हो चुके और पति अभी इतना परिचित ही नहीं हुआ होता है कि उससे कुछ बोल सकें। जब कुंदन को ससुराल वाले MA में एडमिशन की सलाह देते हैं तो एडमिशन फी के पैसे के लिए उसकी दुविधा को बहुत ही बारीकी से दिखाया गया है।इस नॉवेल की एक पात्र कुंदन की दादी भी हैं जो कि खुद ही एक सम्पन्न मायके से तालुक रखती हैं लेकिन अपने पति यानि कुंदन के दादा जी को बहुत पहले ही खो चुकी हैं। वृद्ध होती महिला और घर से छूटती उनकी पकड़ और उसका उनपे पड़ते मनोवैज्ञानिक असर को बखूबी उकेरा गया है।मुझे इस नॉवेल की सबसे बड़ी खासियत ये लगी कि माँ और माँ के प्रेम का कहीं भी कवितीय महिमामंडन नहीं किया गया है। बिलकुल ही यथार्थ चित्रण है।लड़के एक बारीक़ चीज़ जो देख सकते हैं वो ये है कि एक केयरिंग डेवोटेड पति की कुछ बातें जो उसके लिए अति सामान्य होती है लेकिन पत्नी को अंदर तक बिंध देती है।पेरेंट्स को बाल मनोविज्ञान को समझने लायक कई चीज़ें और घटनाएं इस नॉवेल मिलेंगी। ये चीज़ें काफी सामान्य है, हर घर-परिवार में होती है लेकिन कुंदन की आँख से देखने के बाद पेरेंट्स एक बार गहराई से जरूर सोचेंगे।