Home
Quotes New

Audio

Forum

Read

Contest


Write

Write blog

Log In
Category : Art
सबक-शो्र्ट फिल्म
 Manisha Joban Desai  
 14 February 2018  
Art

https://www.youtube.com/watch?v=F47_jqFcmEgलघुकथासबकएस्क्यूज़ मी, ये बस कहाँ जा रही है?रजिता ने साथ खड़े हुए युवक को पूछा, उस युवक ने घडी में टाइम देखा और रजिता को ऊपर से नीचे देखते हुए काउंटर प्रश्न किया,"मेडम, नयी हो क्या शहरमें? यहाँ से तो दो-तीन जगा ही बस जाती है""जी, मुझे शहर के बाहर की यूनिवर्सिटी में जाना है""हां वहाँ तो यही से बस जायेगी, मुझे तो लगा आप किसी फैशन कॉन्टेस्ट में जा रही हो ।""क्या मतलब है आपका?"बस ऐसे ही लगा मुझे, ये आपका जींस-डिज़ाइनर टॉप-गॉगल्स-और सर पर कैप और ये ऊँची दिखने के लिए ३ इंच की सेंडिल ""ये सब मेरा पसॅनल मामला है, मुझे क्या और क्यों पहनना है खेर थेंक्स, बस की जानकारी देने के लिए"इतना बोलकर रजिता चुपचाप खड़ी रही।इतने में बस आयी ।बस के अंदर जाते हुए भीड में उस युवक ने रजिता की कमर पर टच किया ।रजिता ने घूरकर देखा ।बस के अंदर काफी भीड़ थी तो लाइन में खड़े हुए पीछे से वह युवक काफी गन्दी हरकतें करने लगा ।"आप सीधे खड़े रहेंगे की मैं आपकी कम्प्लेन करूं?"" हा...हा ...हा ...हॅसते हुए वह बोला,ऐसे कपडे पहननेवाली लड़की की कम्प्लेन कौन सुनेगा? कॉलेज में तेरे जैसी सब लड़कियाँ मज़ा करने ही आती है "और ये सुनकर फटाक से रजिता ने पीछे घूमकर उस युवक को दो-तीन थप्पड़ जमायें और बस को रुकवाया,अपना आई कार्ड दिखाते हुए बोली,"मिस्टर मजनू, तू अब पकड़ में आया है, तेरी बहोत सारी कम्प्लेन आयी है, मैं इस एरिया की नयी पुलिस इन्स्पेक्टर हूँ।और लड़कियाँ जींस अपनी कम्फर्ट-सेफ्टी के लिए, गॉगल्स धुप से बचने के लिए और ये शार्प सेंडिल तेरे जैसे मजनू को पीटने के लिए पहनती है"और वहाँ खड़े सभी पब्लिक ने इन्स्पेक्टर रजिता को बधाई दी-मनीषा जोबन देसाई

सुनो... बताना है तुम्हे कुछ!
 Aastha Pathak  
 10 March 2018  
Art

सुनो...तुम्हें काफी कुछ बताना है.बताना है तुम्हें की चाँद के पूरे दिख जाने में तुम शिद्दत से याद आते हो.औरउसके बाद मन में महसूस होता अकेलापन,अमावस की रात सा हो जाता है चाँद के बिना सियाह!तुम्हारे सो जाने के बाद...तुम्हें बताना हैकी तुम सोते हुए कितने प्यार से भरे लगते हो.जैसे एक नन्हा सा बच्चा अपनी बड़ी आँखों से निहारता है घटते बढ़ते चाँद को।बताना है यह भी...कि तुम जो यूँ दूर हो जाते हो!यह हुनर तुमने सीखा है चाँद से,या चाँद ने सीखा है तुमसे यूँ बादलों में छिपम छिपाई का खेल.तुम्हे बताना है..कि रात के करीब ढाई बजे जब या तो सब सोये हैं या मशगूल हैं तन्हाई या इश्क़ में,मैं अपने असाइनमेंट पूरे करने में लगी हूँ.तभी अचानक एक हल्का सा हवा का झोंकाचुरा लाया है खुशबु तुम्हारी,हज़ार किलोमीटर दूर मुझ तक।देखो इस तरह हवा का मज़ाक करना मुझे कतई नहीं पसंद।सुनो...सुन रहे हो ना!!!

इच्छा शक्ति
 Mitali Paik Akshyara  
 10 May 2018  
Art

                    इच्छा शक्ति   अभी गर्मियों की छुट्टियां पड चुकी हैं।साल भर बच्चे पढ़ाई पूरी करके और मम्मियां घर के काम करके त्रस्त हो चुकी हैं।इसीलिए सबको गर्मी की छुटियों की इंतज़ार रहता है ।अपनो से मिलने की और अपनी थकान दूर करने की तलब सी लगती है ,ऐसा लगता है जैसे सबको और एक साल के लिए पावर बुस्टर मिल जाता है । चाहे दादा दादी हो या नाना नानी हो,साल भर से पलकें बिछा के बैठे रहते हैं अपनी पोते पोतियों को मिलने के लिये और कुछ वक़्त बिताने के लिए ।        चलिए आप सबको मै  अपनी गर्मी की छुटियों की एक कहानी बताती हूँ । एक बार गर्मी की छुट्टियों में मैं अपने मम्मी पापा और बहनों के साथ मामा के घर गई थी । बहुत जगह घूमे,मामा के साथ खेलना,मामी के मज़ेदार जोक्स,नानी की कहानियां और कई मज़े किये । अब घर वापस आने का समय आ गया था ।जिस दिन घर वापस अपनी गाड़ी में लौट रहे थे तब मेरे मन में घटगावँ स्थित माँ तारिणी मंदिर जाने की बहुत इच्छा हुई क्यों कि मेरी उनमें बहुत श्रद्धा है , उनके मंदिर तो बहुत बार गई हूँ लेकिन आज कुछ ज्यादा ही इच्छा हो रही थी माँ से मिलने की । मै पापा और ड्राइवर अंकल को पूछी की क्या हम मंदिर के रास्ते से जा सकते हैं,मुझे माँ के दर्शन की बहुत इच्छा हो रही है, पापा बोले नही बेटा अब तो सात बज रहे हैं और रात को चोरों का भी डर रहता है और रास्ता भी ठीक नही  है । मै थोड़ा दुखी हो गई क्यों कि मै अपनी माँ तारिणी के लिए नारियल भी लायी थी । मेरी माँ को नारियल बहुत पसंद है । लोग तो अपनी मन्नत के लिए एक सौ आठ नारियल का दान करते हैं  और उन्हें नारियल की देवी भी बुलाते हैं । पापा जैसे ही मना किये मै थोड़ा दुखी होकर अपने स्थान पर बैठ गई , दुख के कारण आखों से आंसू  भी निकलने लगे । मन ही मन माँ तारिणी जी को स्मरण की और बोली माँ आपसे मिलने की बहुत इच्छा हो रही है पर अब मै क्या करूँ  सोचते सोचते और रोते रोते कब आँख लग गई पता नही चला । करीबन रात 9 बजे के आस पास मुझे पापा की और ड्राइवर अंकल की आवाज़ सुनाई दी और दोनों मुझे जगा रहे थे कि देखो बेटा तुम्हारी माँ का मंदिर आ गया।  मै चौंक गई और पूछी आप तो इस रास्ते से नही आने वाले थे । तब ड्राइवर अंकल बोले कि जहां से रास्ता दो हिस्से में बंट रहा  था ,वहाँ मै समझ नही पाया कि  किस तरफ जाना है और उसी समय पता नही मुझे जैसे लगा कि कोई मेरे हाथ से स्टीयरिंग को मंदिर की रास्ते की तरफ मोड़ रहा है । कुछ देर बाद मुझे पता चला कि ये तो माँ तारिणी जी के मंदिर वाला रास्ता है । मै बहुत अचंभित थी,मंदिर के सामने गाड़ी रुकी । मंदिर की रोशनी, उसका तेज़ ,मानो लग रहा था कि माँ अपना आंचल फैलाए मेरी ही प्रतीक्षा कर रही हो और यही बोल रही हो कि जिसे मुझसे मिलने की इतनी इच्छा हो उसे मैं निराश कैसे कर सकती हूँ । दौड़ के अंदर गई,पंडित जी को नारियल सौंप के ,माँ तारिणी जी की वो ममता रूपी आंचल में लिपट गई ।तब पता चला, मन की शक्ति   के आगे तो भगवान भी हार मानते हैं  ।           दोस्तों जब भी आप ओडिशा जाएंगे घटगावं स्थित माँ तारिणी मंदिर  देखना मत भूलियेगा । साथ में नारियल भी लेके जाना,बहुत दयालु है मेरी माँ। सबके ऊपर कृपा करती हैं , लेकिन मन में इच्छा होनी चाहिए  जय माँ तारिणी   संकट हारिणी                                                    आप सबकी                           मिताली।।

बादल सरकार की रंगचेतना और "पगला घोड़ा"
 Gaurav Bharti  
 17 May 2018  
Art

बादल सरकार की रंगचेतना और'पगला घोड़ा'                                भारतीय भाषाओँ में बांग्ला रंग-समृद्धि के दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण भाषा है | बांगला भाषा में योगेन्द्र चन्द्रगुप्त, दीनबंधु मिश्र, रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि प्रसिद्ध नाटककार हुए | इन्होने मुख्यतः सामाजिक , ऐतिहासिक , एवं काव्यात्मक प्रतीकात्मक नाटकों की सृष्टि की है |बदल सरकार ने रंगमंच पर रंग-संकेतों और नाटकों के माध्यम से जीवन को चित्रित किया है |बदल सरकार ने अपनी रचनाओं में समाज और व्यक्ति की परिस्थिति को सरलता सेपात्रों के माध्यम से मंचित करने के लिए अति सामान्य साधनों का प्रयोग करतेहैं | वे पार्श्व संगीत , प्रकाश व्यवस्था , मंच उपकरण और वेशभूषा आदि का भी बखूबी प्रयोग अपनी रचनात्मकता को मूर्तता प्रदान करने के लिए करते है | इन सभी के माध्यम से वे अपने नाटकों के लिए रंगभाषा का निर्माण करते हैं |गौरतलब है कि बादल सरकार ने परम्परागत रुढ़िग्रस्त उपकरणों को त्यागते हुए नवीन उपकरणों की सहायता से नाटक लिखे है | नाट्यशास्त्र में उल्लेखित रंगमंचीय वर्जनाओं को तोड़ते हुए दर्शकों से सीधा संवाद स्थापित करने की सफल कोशिश करते हैं | नई राह तलाशते हुए वे कम खर्चीले रंगमंच (तीसरा रंगमंच) की भी परिकल्पना करते हैं और नाटक को आम आदमी तक पहुँचाने का कार्य करते हैं | बकौल जयदेव तनेजा " तीसरा रंगमंच- शहरी आभिजात्य एवं देहाती लोक रंगमंच के संश्लेष से जन्म लेता है | रंगकर्म को वस्तु ,रंगकर्मी को विक्रेता तथा दर्शक को खरीदार उपभोक्ता बनने से रोकता है | टिकट -बिक्री का विरोधी है | रंगकर्म को 'कला कला केलिए' शुद्ध सौंदर्यवादी प्रदर्शन या व्यवसाय बनाने के बजाय कला को जीवन एवंसमाज को बेहतर और जागरूक बनाने का माध्यम समझता है |”[1] बादल सरकार ने नाटकों का प्रणयन करने के क्रम में नाटकों को दृश्यों और अंको में नियोजित ढंग से बाँटने , काल को एक क्रम में सजाने ,स्पेस कीसीमाओं को बाँधने आदि के यांत्रिक नियमों से खुद को अलगाते हैं | उनका कहना है " मैंने मंच को एक ही साथ विभिन्न काल और स्थान के लिए प्रयोग किया | साथ ही मेरा आग्रह समूह अभिनय , मूकाभिनय, छंदमय गति, गीत और नृत्य परज्यादा रहा और इस प्रकार 'भाषा' के महत्त्व को हम काफी हद तक कम कर सके | सेट आदि इतने साधारण थे कि उन्हें कहीं भी आसानी से ले जाया जा सकता था |"[2]बादल सरकार की खासियत यह रही है कि पात्र के माध्यम से ही समाज के कड़वेसत्य को उद्घाटित करते हैं | जीवन के यथार्थ को दर्शकों के सम्मुख लाने के लिए वे पात्र के मुख से ही जीवन के सार को भी व्यक्त करते हैं | उनका मानना था कि " नाटक एक जीवंत प्रस्तुति है - वह स्वाभाविक रूप से मनुष्य पर ज्यादा निर्भर करता है तो अभिनेता और दर्शक भी है | इसी से उसे इस बात का भी गहरा एहसास होता है कि रंगमंच की कला का मूलभूत उपकरण मनुष्य का शरीर हीहै | प्रकृतिवादी रंगमंच से बेहतर उसके इन एहसासों को एक नया आधार मिला |"[3] बादल सरकार रंगमंच को जनता के लिए सहज बनाना चाहते थे ,जिसके लिए नाटक का मंचन सामान्य करना आवश्यक था | बादल सरकार ने प्रश्न उठाया है कि रंगमंच के लिए उपकरणों की क्या आवश्यकता है | मंचन के लिए साधारण मंच भी सफल अभिनय से प्रभावी बन जाता है | गौरतलब है कि बादल सरकार के नाटकों के संवादों में नैरेशन होता है | प्रश्न होते हैं | अभिनेता से अभिनेता के संवाद हैं तो वहीँ समूह में संवादों को दोहराने की प्रक्रिया भी है |                                             बात जब हम 'पगला घोड़ा' की करते है तो यह नाटक स्त्री-विमर्श के इस दौर  में पुनर्व्याख्या की भी मांग करता है | जहाँ चारों स्त्री पात्र अपनी अतिभावुकता , असफल प्रेम , और सामजिक छद्म का शिकार हो मृत्यु का वरण कर लेती हैं | पुरुष के छद्म प्रेम, बनावटी सामजिक मर्यादा और पुरुषवादी मानसिकता किस तरह स्त्री मन का शिकार का करती है उसे यहाँ पर सहज देखा जाताहै | ख़ामोशी जो एक चीख बनकर पाठक और दर्शक का ह्रदय झकझोर देती है | जहाँ तक रंगशिल्प की बात है इस पूरे नाटक में एक ही दृश्यबंध है |  सभी स्त्री चरित्रों की मूलभूत समानता और विडम्बना दिखाने के लिए नाटककार ने एक ही अभिनेत्री द्वारा विभिन्न नारी चरित्रों के अभिनय की परिकल्पना की है,जिसका प्रयोग आगे चलकर मुद्राराक्षस .विजय तेंदुलकर और मोहन राकेश भी करते हैं | वे नाटक के सन्देश को भाषित करने के लिए एक निर्जन गाँव के शमशान ,जिसके पास एक कोठरी जिसमें मुर्दा जलाने वाले रुकते हैं ,का चयन करते हैं |इसी केअनुरूप मंच का सयोजन करते हैं | मंच को दो भागो में विभाजित किया गया है ,जिसमे दाहिनी ओर की जगह कोठरी के बाहर का है , जहाँ दूर जलती हुई चिता है |रात का समय है और कमरे में पेट्रोमेक्स जल रहा है | खिड़की खुली हुई है | दरवाजे के पीछे दूर कहीं आग जलने का आभास मिलता है ,उसकी लाल रौशनी रह-रह कर नाच उठती है | कोठरी के पीछे की ओर एकदम अँधेरा है | मंच पर पर्दा खुलने पर कोठरी में चार आदमी ( सातू, कार्तिक, हिमाद्री, शशि ) बैठे 'ट्वेंटी नाइन ' खेल रहे हैं , दो चौंकी पर बैठे हैं दो स्टूल पर | खेल 'एक हाथ' पूरा होने के बाद उनके बीच बातचीत शुरू होती है | यहीं से बदल सरकार के रंगशिल्प की चेतना का निदर्शन होने लगता है |चिता जलाने आए चारों आदमियों की बातचीत शुरू होती है और "अचानक अन्धकार भेदकर लड़की की हँसी सुनायी पड़ती है | कमरे के बाहर का अँधेरा हिस्सा आलोकित हो उठता है | लड़की के बाल खुले हैं, आँचल कमर में बंधा है | वह हँसे ही जारही है | कमरे की रौशनी बुझ गई है, तीनों छाया जैसे दिख रहे हैं | वे तीनों स्थिर हैं, उनमें से किसी ने लड़की की हँसी नहीं सुनी है |"[4] लड़की जलती चिता से उठकर आती है | वह मुर्दा जलाने आए चारों पुरुषों को छेड़कर उनके अवचेतन में दबी-घुटी उनकी दमित इच्छाओं और जीवन के प्रेम-प्रसंगों को याद करने के लिए उकसाती है | यहाँ तक बादल सरकार ने मंच को बहुत ही सामान्य रखा है | वे जीवन के शाश्वत सत्य मृत्यु जैसे प्रसंग से नाटक का प्रारम्भ करते हैं | यह एक प्रकार से उनकी गहरी प्रयुक्तात्मक नजरिए का परिणाम है और वे इस नाटक के द्वारा समाज में व्याप्त हताशा, निराशा, कुंठा आदि को दर्शाने का प्रयास करते हैं | वे मानव जीवन में प्रेम के आभाव के पक्ष को सामने लाने का प्रयत्न करते हैं साथ ही आदिकाल से स्त्री की अतिभावुकता, जिसका शिकार वह स्वयं होती आयी है उसे भी स्वर दिया है |ध्यातव्य है कि लड़की अपने जीवन में एक पागल की विवाहिता और एक नपुंसक , अय्याश (मलिक बाबू) के मन-बहलावका साधन रह चुकी है | कभी किसी का प्रेम न पा सकने की पीड़ा को सहने में असमर्थ होकर और इसी कारण जीवन को अर्थहीन मानकर वह आत्महत्या कर लेती है | यह लड़की शराब से शिथिल - चेतन हुए चारों आदमियों के आसपास मंडराती है और उन्हें छेड़कर अपने अतीत में झाँकने को विवशकरती है | लड़की के द्वारा प्रेरित करने पर वे चारों पुरुष जीवन के उन प्रेम प्रसंगों को जीने लगते हैं, जिनमे उनकी कायरता, नपुंसकता, उपेक्षा, अहंकार भाव आदि के कारण उनकी प्रेमिकाओं को विवश होकर आत्महत्या करनी पड़ती है | प्रतिभा अग्रवाल लिखती हैं  " नाटक की लड़की का प्यार खोजना , उसके लिए तड़पना ,भटकना आज के इस युग के वैयक्तिक अकेलेपन का तीव्र एहसास है - जो हम बार-बार महसूस करते हैं | कोई अपना नहीं | अपने भी अपने नहीं | हम सन कटेकटे अकेले | आकाश की सीमाहीनता में भटकती उल्काएँ और जो कहीं कुछ अपना मिलने की आशा होती है ,वहां हम उसे आगे बढ़कर ले नहीं पाते | हमारी कायरता , हमारी अकर्मण्यता और नपुंसकता हमारे सामने दीवार खड़ी कर देती है |"[5]                                                        'पगला घोड़ा' के सन्दर्भ में प्रतिभा अग्रवाल जी का कथन एकदम सटीक है | बादल सरकार 'पगला घोड़ा' को 'मिष्टी प्रेमेर गल्प' अर्थात 'मधुर प्रेम कहानी' कहते हैं | यहाँ पर शमशान और मृत्यु की बीभत्सता को बादल सरकार ने प्रेम की मधुरता में रूपांतरित कर दिया है जिसमें पुरुष के तथाकथित संभ्रांत रवैये को भी देखा जा सकता है जहाँ वह अपनी कायरता, नपुंसकता, द्वंद्व ,कमजोरी आदि को छिपाता है तो वहीँ स्त्री के शोषित रूप को भी देखाजा सकता है और इन सब के बीच बादल सरकार के जीवन के प्रति आस्था का अवलोकनभी संभव है | जयदेव तनेजा लिखते हैं  "एक ही लड़की बार-बार कभी उच्च वर्ग की आधुनिक मिली , कभी मध्यवर्ग की आदर्शवादी पढ़ीं- लिखी मालती और कभी निम्न वर्ग की अनपढ़ किन्तु मानी और अनन्य - प्रेमिका लक्ष्मी बनकर आना और पुरुष के अहंकार अथवा कायरतापूर्ण स्वार्थ से टकराकर आत्महत्या के लिए विवश होना ...आदिकाल से लेकर आज तक अलग-अलग रूपों में पुरुष द्वारा स्त्री के शोषण की बेबस स्थिति का जीवंत रेखांकन कर देता है |"[6] नाटककार के शब्दों में “लड़की का एक मात्र दोष यह था कि वह लड़की थी |”[7]         किन्तु ध्यातव्य है कि लड़की मानती है कि प्रेम में पीड़ा पाकर मार जाना भी जीवन की सार्थकता है | इसलिए लड़की मालती, मिली और लक्ष्मी को भाग्यवान समझती है क्योंकि ये सभी प्रेम पाकर और प्रेम देकर मरती है |                                बादल सरकार ने रंग-संकेतों के माध्यम से कोठरी के पात्रों और कोठरी के बाहर जलती चिता को प्रस्तुत किया है लेकिन नाटक में रौशनी का प्रयोग भी एक चलते और संवाद करते हुए पात्र के भांति हुआ है | पीछे मंच पर रह-रह कर चिता की आग की रौशनी दिखाई पड़ती है जो चेहरों के दुःख –दर्द और खालीपन को उभारती चलती है |नाटककार ने नाटक में बांग्ला बाल कविता के माध्यम से दर्शकों के भाव–संवेदना के तंतुओं को हिलाने का प्रयास किया है | लड़की की वेदना कविता के स्वर की तरह उसके चेहरे पर भी उभरने लगती है –                                  “आम का पत्ता जोड़ा –जोड़ा                                    आम का पत्ता जोड़ा-जोड़ा मारा चाबुक दौड़ा घोड़ा |छोड़ रास्ता खड़ी हो बीबी                      आता है यह पगला घोड़ा |”[8]   वास्तव में यह एक बाल कविता है लेकिन उस लड़की के आंतरिक भावनात्मक उथल पुथल को भी स्पष्ट करता है | जयदेव तनेजा लिखते हैं-“ बादल सरकार ने बांग्ला के इस लोकप्रिय बाल –गीत में आए पगला घोड़ा का शीर्षक में ही नहीं बल्कि नाटक के कथ्य और मूल चरित्र को उद्घाटित करने में भी एक प्रतीककी तरह अत्यंत रोचक और नाटकीय प्रयोग किया है | जीवन शक्ति या ऊर्जा के उन्मत्त और अनियंत्रित रूप ‘प्रेम; को ‘पगला घोड़ा’ कहना वास्तव में इस परिचित शब्द का व्यंजनापूर्ण एवं सार्थक प्रयोग ही कहा जायेगा |”[9]                                     ‘पगला घोड़ा’ प्रेम के पागलपन का बिम्ब तैयार करता है ,जिसे एक ट्रेजिक बिम्ब कहा जा सकता है | इस पागलपन का शिकार चारों स्त्रियाँ हो चुकी हैं | चरों ने एक तरह से अपने जीवन काक अंत कर लिया | रंगमंच पर नाटक के प्रभाव को बनाए रखने के लिए बादल सरकार ने शमशान , आधी रात , जलती चिता ,कुत्ते का रोना , सातू का अट्टहास ,लड़की की हंसी ,शराब की उन्मुक्तता आदि का कल्पनाशील, एवं नाट्यानुभूति  की दृष्टि से सारगर्भित प्रयोग किया है | सम्पूर्ण नाटक को प्रभावपूर्ण बनाये रखने के लिए नाटककार ने जिस प्रकार पूर्वदीप्ति तथा स्थिरीकरण की तकनीक का उपयोग किया है वह भी अनुकरणीय है |                                गौरतलब है कि विरोध वैषम्य के माध्यम से बादल सरकार ने अद्भुत नाटकीयता पैदा की है | कहानियों को तोड़ने और जोड़ने के लिए मनोविज्ञान के साहचर्य नियम का अत्यंत कुशलता के साथ प्रयोग किया है जो रंगशिल्प की दृष्टि से महत्वपूर्ण है | सातू के संवाद में आए खाते-पीते शब्द से ‘पीते’ शब्द को पकड़कर कार्तिक पीने के लिए बोतल निकालने की बात कहता है | कुत्ते के रोने की आवाज से सातू को लक्ष्मी के कुत्ते भुलुआ की स्मृति ,उसे बार–बार अतीत में ले जाती है | शराब पीते ही शशि का सर भारी होने लगता है और मन में उमड़ता-घुमड़ता मालती प्रसंग मुखर हो उठता है | कार्तिक के सामान्य से प्रश्न “क्या वैसी कोई चीज आपको नहीं मिली ?” तथा सातू के साधारण से उत्तर “कहाँ मिली?” में अनायास आ गए ‘मिली’ शब्द से हिमाद्री को अपनी प्रेमिका ‘मिली’ की याद में खो जाना स्वाभाविक ही है |                कहना न होगा कि बादल सरकार संवादों के माध्यम से दृश्य-बिम्ब तैयार करने में माहिर थे | वे स्थितियों और संवादों  के नाटककार थे | लड़की कहती है –“क्या करोगे जानकार ? उससे क्या बनता – बिगड़ता है ? मैं जिंदा ही क्यों रही ? मैंने जिंदगी में क्या पाया ? किसी को क्या दिया ,कोई बता सकता है |”[10] यहाँ इस संवाद से पता चलता है कि लड़की अपने जीवन में घटी घटनाओं से विचलित होकर आत्महत्या कर लेती है | मन की दबी हुई पीड़ा भी इस संवाद के माध्यम से मुखर होता है | बादल सरकार की विशेषता है कि वे मंच परिकल्पना के द्वारा ही पातेरों केव अभिनय को अधिक विश्वसनीय बना देते हैं |बकौल जयदेव तनेजा “संवाद इस नाटक की प्रभावशीलता का एक प्रमुख तत्व है | चरित्रों के शारीरिक-मानसिक और परिस्थितिगत भेद को रचनाकार ने व्यवहार और कथोपकथन की विशिष्ट शैली द्वारा बड़ी विश्वसनीयता से स्थापित किया है | चरों पुरुष पात्र समय-असमय हँसते हैं लेकिन नाटककार ने चारों की हंसी के फर्क का स्पष्ट निर्देश भी गाहे-ब-गाहे आलेख में किया है | कार्तिक का तकिया कलाम की तरह बार-बार ‘तारा-तारा काली ब्रहमई माँ’ की गुहार लगाना उसे फ़ौरन बांकी सबसे एक अलग पहचान देता है |यही बात निम्नवर्ग की अपढ़-गंवार लक्ष्मी के संवादों के ग्राम्य-स्पर्श के बारे में कही जा सकती है |मार्मिकता ,विदग्धता, हास्य-व्यंग्य, विडंबना और प्रभावशीलता इन संवादों की प्रमुख विशेषताएँ हैं |”[11]                                               कहना न होगा कि बोलचाल के शब्दों और मुहावरों का प्रयोग भाषा को  प्रभावी बनता है |वह किरदार की आंतरिकता से जुड़कर उसे ज्यादा मुखर बना देता है | सातू के द्वारा- ‘बावन तोले पाव रत्ती’, ‘चक्कर में पड़ना’,’सोलह आने खड़ी’,’न घर का न घाट का’ , जैसे मुहावरों का प्रयोग करना उसके चरित्र को अधिक स्पष्टता के साथ सामने लाता है |बादल सरकार ने चरित्रांकन में मनोविज्ञान का सराहनीय प्रयोग किया है |’गलतियों का मनोविज्ञान’ इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है |अवचेतन की दमित भावनाओं के जोर और चेतन पर शराब के प्रभाव के कारण पात्र असली बात को छिपाने और बताने के द्वंद्व में कई जगह बोलने का कुछ बोलता कुछ और है जो उसके अतीत के पन्ने तो खोलता ही है साथ ही उसके व्यक्तित्व को समझने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मालूम होता है |रंगमंच की दृष्टि से यह नाटक के रंगशिल्प की उपलब्धि है जिसे यथार्थवादी मंच सज्जा में भी मंचित किया जा सकता है |इस नाटक में प्रकाश व्यवस्था और ध्वनि व्यवस्था का माकूल प्रयोग किया जा सकता है |नाटक की प्रस्तुति में बदल सरकार द्वारा प्रणीत दृश्य अत्यंत प्रभावी है | इसके लिए वे लिखित रूप से स्पष्ट निर्देश देते हैं-“लड़की अंधकार में खो जाति है | बाद की बातें अँधेरे में ही उसकी रुलाई में डूब-सी जाती है |”[12] वस्तुतः इस नाटक का रंगशिल्प संवादों के आधार पर ही खड़ा है | नाटककार ने संवाद के माध्यम से कार्य-व्यापार को बढ़ाने,वर्तमान जीवन की यांत्रिकता ,एकाकीपन ,और विसंगत स्थिति में व्यक्ति की छटपटाहट और आक्रोश को शब्द देने में अद्भुत सफलता हासिल की है |संवादों के माध्यम से जीवन के प्रति साकारात्मक और नकारात्मक दृष्टिकोणों के द्वंद्व और अंततः जीवन के प्रति साकारात्मक  दृष्टि की जीत को बहुत प्रभावशाली रूप में व्यक्त किया गया है |रंगशिल्प पर विचार करते हुए जयदेव तनेजा लिखते हैं –“रंगशिल्प की दृष्टि से पगला घोड़ा एक अनूठी रचना है |मृत लड़की का जलती चिता से उठकर आना और जीवित व्यक्तियों से छेड़छाड़ करके उन्हें मन के अवचेतन में दबी-घुटी स्मृतियों को याद करने के लिए प्रेरित करना ,अतीत के क्षणों को वर्तमान में जीते इन पात्रों के लिए उनकी पप्रेमिकाएँ बनना ,अतीत और वर्तमान की काल-विभाजक सीमाओं को मिटा देना एक ऐसी अद्भुत रंग-युक्ति है,जो नाटक को यथार्थ से हटाकर अयथार्थ या फैंटेसी की दुनिया में ले जाती है |”[13] नाटक के रंगशिल्प और कथ्य की प्रासंगिकता ने श्री टी.पी. जैन, शम्भू मित्र, श्यामानंद जालान, सत्यदेव दुबे,दिनेश ठाकुर,जैसे रंगकर्मियों को अपनी ओर आकर्षित किया और उन्होंने उसका सफल मंचन भी किया |‘पगला घोड़ा’ बादल सरकार की रंग चेतना की महत्तम उपलब्धि है | जिस तीसरे रंगमंच की परिकल्पना बादल सरकार ने की उस दृष्टि से भीं यह नाटक सफल है | नाटक जहाँ शिल्प और कथ्य की दृष्टि से भारतीय नाट्यशास्त्र की वर्जनाओं  को तोड़ता वहीँ मृत्यु के माध्यम से जीवन को देखने –समझने का जो अवसर प्रदान करती वह महत्वपूर्ण है | प्रकाश और ध्वनी इस नाटक इस नाटक के रंगशिल्प में अत्यंत महत्वपूर्णबनकर सामने आते हैं |यह नाटक महज प्रेम कहानी नहीं है बल्कि इसके माध्यम से नाटककार पुरुष के अहम् ,मिथ्या डर,छद्म मानसिकता और तथाकथित नैतिकता पर भी आघात करता है | वहीँ स्त्री-मन के कोमल पक्षों को शब्द देकर नाटककार उसे संवेदनात्मक धरातल पर मार्मिक बना देता है |वहीँ नाटककार जिंदगी के प्रति ललक पैदा करता है और दर्शाता है कि जिंदगी हर हाल में खुबसूरत है क्योंकि जिंदगी है तो संभावनाओं का खुला आसमां हमारे पास है |अंततः यही कह सकते हैं ‘जिंदगी महज एक उम्र नहीं ,जिसे यूँ ही बर्बाद किया जाए|’गौरव भारती शोधार्थी भारतीय भाषा केंद्र जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय कमरा संख्या-108झेलम छात्रावास पिन कोड-110067मोबाईल-9015326408इमेल-sam.gaurav013@gmail.comसन्दर्भ :- [1] . आधुनिक भारतीय रंगलोक, जयदेव तनेजा ,पृष्ठ संख्या - 132, भारतीय ज्ञानपीठ , प्रथम संस्करण -2006, नई दिल्ली[2] . बादल सरकार - व्यक्ति और रंगमच , अशोक भौमिक ,पृष्ठ संख्या - 51 ,अंतिका प्रकाशन ,पेपरबैक संस्करण - 2009[3] .वहीँ ,पृष्ठ संख्या -81[4] . पगला घोड़ा, बादल सरकार, अनुवाद-प्रतिभाअग्रवाल, पृष्ठ - 29, राजकमल प्रकाशन, दूसरा संस्करण-2014[5] पगला घोड़ा, बादल सरकार, अनुवाद-प्रतिभा अग्रवाल, पृष्ठ - 13, राजकमल प्रकाशन, दूसरा संस्करण-2014[6] .आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श , जयदेव तनेजा, पृष्ठ संख्या - 223-224, राधाकृष्ण प्रकाशन ,प्रथम संस्करण -2010 [7] .पगला घोड़ा, बादल सरकार, अनुवाद –प्रतिभा अग्रवाल,पृष्ठ संख्या -29 [8] . वही ,पृष्ठ संख्या- 35 9 . आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श , जयदेव तनेजा, पृष्ठ संख्या – 220, राधाकृष्ण प्रकाशन ,प्रथम संस्करण -2010[10] .पगला घोड़ा, बादल सरकार, अनुवाद –प्रतिभा अग्रवाल,पृष्ठ संख्या -112[11] . आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श , जयदेव तनेजा, पृष्ठ संख्या – 228-229 , राधाकृष्ण प्रकाशन ,प्रथम संस्करण -2010[12] . पगला घोड़ा, बादल सरकार, अनुवाद –प्रतिभा अग्रवाल,पृष्ठ संख्या -79[13] . आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श , जयदेव तनेजा, पृष्ठ संख्या – 229, राधाकृष्ण प्रकाशन ,प्रथम संस्करण -2010

समीक्षा ' मैं शबाना ' - फारूक आफ़रीदी
 Yusuf Rais  
 20 June 2018  
Art

#मैं_शबाना उपन्यास में क्या है खास जिसे पढ़ना चाहेंगेआज आप पढ़ेंगे मुस्लिम परिवेश को लेकर Yusuf Rais के शानदार उपन्यास #मैं_शबाना की समीक्षा । शबाना की गमगीन जिंदगी आपको झकझोर कर रसमीक्षा/ जिंदगी की जद्दोजहद और दुश्वारियों का आईना है उपन्यास ‘’मैं शबाना’’-फारूक आफरीदी - शबाना इस उपन्यास का मुख्य किरदार है और सारी कथा इसके इर्दगिर्द ही घूमती दिखाई देती है।इसकी कथा को कुछ इस तरह बुना गया है जिसके जरिए मुस्लिम स्त्रियों के अधिकारों पर कुठाराघात, उनके प्रति समाज के गैर जिम्मेदार और उपेक्षापूर्ण रवैये और सामाजिक सोच को बखूबी समझा जा सकता है।उपन्यासकार ने इसे आज के तीन दशक पहले के हवाले से रचते हुए मौजूदा दौर तक ला खड़ा किया है।शबाना एक अच्छे खासे खाते-पीते जागीरदार परिवार की महिला है।उसकी तालीम और परवरिश भी उसी के अनुरूप हुई और व्यस्क होने पर एक बराबर के ही खानदान के नौजवान असलम से उसका निकाह हो जाता है । वह अपने होने वाले शौहर और उसके खानदान के बारे में पहले से कुछ नहीं जानती । शादी से पहले वह अपनी माँ से सवाल पूछती है- ‘’मैं जिस घर में जा रही हूँ, वहां के लोग कैसे हैं ? क्या मुझे ये जानने का हक़ नहीं था ? आपने मेरे हक़ में बेहतर ही किया होगा लेकिन मैं कोई बेजान खिलौना तो नहीं;जिसे आप सजा कर जिसे चाहें सौंप दें?’’ माँ जवाब देती है- ‘’ये औरतों की बदकिस्मती है कि वो अपनी जिंदगी का कोई फैसला नहीं कर सकती है।‘’ शबाना का शक सही निकलता है क्योंकि ससुराल पहुँचने पर उसे पता चलता है कि जिससे उसका निकाह हुआ वह शख्स किसी दूसरी लड़की से मोहब्बत करता है मगर उसकी मर्जी को तवज्जो देने का तो वहां कोई रिवाज ही नहीं था। सुहागरात के दिन से ही उसके और शबाना के बीच दांपत्य जीवन के वे तार नहीं जुड़े जिनकी दाम्पत्य जीवन की नींव में जरुरी दरकार होती है। इससे शबाना बिलख पडती है किन्तु उसने प्रण कर लिया है कि वह एक दिन असलम का दिल जीतने में कामयाब हो जाएगी।उसे अपनी फूफी जान की यह बात याद आ गई कि ‘’मर्द भले ही दिन भर काबू में ना आए लेकिन बिस्तर पर उसे शीशे में उतारा जा सकता है।’’ मगर उसे वह तरकीब मालूम ना थी। संयोगवश इन कोशिशों के बीच शबाना की माँ के दुर्घटना के हादसे ने दोनों को एक दूसरे के करीब लाने में मदद की जिससे दोनों में मोहब्बत के पुष्प पल्लवित होने लगे। माँ की दुर्घटना के दौरान ही शबाना को अपने और पराए के बीच के रिश्तों की पहचान होती है । घर में उसके मूक बधिर छोटे भाई जुबैर की देखभाल करने को लेकर चिंता और गहरी हो जाती है । एक भाई अपनी पढाई में मशगूल है ।ऐसे ही समय में शबाना अपने ससुराल की एक अजब कहानी से भी रूबरू होती है। असलम, उसके पिता और बड़े भाइयों में आपस में सदभाव का कोई रिश्ता ही नहीं है। सब अपने-अपने फायदों के लिए जी रहे हैं। सब एक बड़ी हवेली में तो जरूर रहते हैं लेकिन उनके दिलों में अप्रत्यक्ष दीवार खींची हुई है।किसी का भी एक दूसरे से सलाम दुआ के अलावा कोई वास्ता नहीं है। शबाना की चूंकि सास नहीं है इसलिए उसके ससुर ने ही बहुओं को रसोई की जिम्मेदारी बाँट रखी है और वे ही तमाम फैसलों के खुद मुख़्तार हैं। ऐसे में शबाना अपने ससुराल में ‘’उस गुलदान की तरह थी, जो घर के एक कोने में नुमाइश के लिए तो रखा जाता है, लेकिन उसमें कभी फूल नहीं सजाए जाते हैं।‘’  शबाना को अपनी जेठानी के जरिये यह बात मालूम होती है कि उसके सबसे बड़े जेठ जुल्फिकार चरित्र के मामले में हद दर्जे तक गिरे हुए एक गलीच किस्म के इन्सान हैं और अपनी ही साली तक को हवश का शिकार बना चुके हैं, जिसने बाद में आत्म हत्या कर ली और इसके बाद उनकी पत्नी उन्हें छोड़कर हमेशा-हमेशा के लिए उनकी जिंदगी से जा चुकी है। यह सुनकर शबाना बुरी तरह घबरा जाती है । वह जब दुल्हन बनकर हवेली में आई तभी से जुल्फिकार उस पर बुरी नज़र रखने लगे, लेकिन वह उससे बचने की हर चन्द कोशिश करती रही ताकि कोई अनहोनी ना हो जाए। सब कुछ पटरी पर चल रहा होता है और उसको पहला बच्चा भी हो जाता है किन्तु शबाना की किस्मत को कुछ और ही मंजूर था और एक दिन अचानक मौका पाकर जुल्फिकार अपनी अश्ली

'मेरा अहम'
 nitin sharma  
 7 July 2018  
Art

एक राजा को जब पता चला कि मेरे राज्य मे एक ऐसा व्यक्ति है जिसका सुबह-सुबह मुख देखने से दिन भर भोजन नही मिलता है।सच्चाई जानने के इच्छा से उस ब्यक्ति को राजा ने अपने साथ सुलाया।दुसरे दिन राजा की ब्यस्तता ऐसी बढ़ी कि राजा शाम तक भोजन नही कर सका ।इस बात से क्रुद्ध होकर राजा ने उसे तत्काल फाॅसी की सज़ा का ऐलान कर दिया।आखिरी इच्छा के अंतर्गत उस ब्यक्ति ने कहा - " राजन - मेरा मुँह देखने से आप को शाम तक भोजन नही मिला , किंतु आप का मुँह देखने से मुझे मौत मिलने वाली है।"इतना सुनते ही लज्जित राजा को संत वाणी याद आ गई....*बुरो जो देखण मै चल्यो , बुरो न मिल्यो कोय।**जो दिल ढूढ्यो आपणो , मुझ सो बुरो न कोय ।।*कमियां अपने में ढूंढो, दूसरों में नहीं...

तेरी ख़ुशी में ही हम सभी की ख़ुशी निहित है
 Gunjan Gera  
 14 July 2018  
Art

कुमकुम की शादी नीरज से हुई।कुमकुम खुद एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी और नीरज एक इंटीरियर डिजाइनर।शादी से पहले कुमकुम पुणे में एक MNC में जॉब करती थी।नीरज कुमकुम के पिता के दूर के रिश्ते में लगता था और उसका इंटीरियर डिजाइनिंग का बिजनेस दिल्ली में था।हालांकि कुमकुम तो एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर से ही शादी करना चाहती थी।चूंकि कुमकुम के पिता को रिश्ता अच्छा लगा और उन्हें नीरज में कोई खामी भी नज़र नहीं आयी इसलिए उन्होंने कुमकुम को भी यह कहकर मना लिया कि शादी दो परिवारों का दो दिलों का मेल है।ना कि प्रोफेशन का।नीरज और उसकी माताजी बहुत समझदार हैं इसलिये वह तुम्हें शादी के बाद दिल्ली में भी जॉब करने देंगे।सबसे मुख्य बात नीरज जब 15 साल का था तभी उसके पिता की मौत हो गयी वह खुद की मेहनत के बलबूते खड़ा हुआ है इसलिए उसे मेहनत का मूल्य भी पता है।नीरज की माँ और उसकी छोटी बहन रीमा आगरा रहते थे।रीमा अभी पढ़ रही थी।शादी के बाद लगभग 2 महीने कुमकुम अपने ससुराल में रही और नीरज दिल्ली।हालांकि हर शनिवार,रविवार को नीरज अपने घर आ जाया करता था।2 महीने बाद कुमकुम नीरज के साथ दिल्ली चली आयी और उसने थोड़े दिन अपना घर सेट करने के बाद जॉब ढूंढनी शुरू कर दी।चूंकि कुमकुम के पहले के रिकॉर्ड्स अच्छे थे इसलिए उसे एक बहुत अच्छी कंपनी में जॉब भी आसानी से मिल गयी।नीरज ने भी कुमकुम को पूरा सपोर्ट किया।वह दोनो अपनी जिंदगी में बहुत खुश थे।हर शनिवार को दोनो कभी कभी आगरा भी चले जाते और कुमकुम अपनी ननद और सास के साथ भी मिलजुल कर रहती।धीरे धीरे 2 साल बीत गए और एक दिन कुमकुम को पता लगा कि वह गर्भवती हो गयी।चूंकि कुमकुम के लिए अकेले सब कुछ मैनेज करना कठिन हो रहा था।इसलिए कुमकुम की सास ने कुमकुम को अब जॉब छोड़कर आगरा आने की सलाह दी।रीमा की भी आगरा में ही एक अच्छे स्कूल में जॉब लग गयी थी।कुमकुम जॉब छोड़कर उनके पास रहने चली गयी।शुरू में तो सब कुछ ठीक रहा लेकिन दिल्ली में नीरज को भी कुमकुम के बगैर अकेला घर खाने को दौड़ता और कुमकुम भी बिना जॉब के आगरा में उदास उदास सी रहने लगी।लेकिन वह अपने आप को यही सोचकर दिलासा देती रहती कि जब बच्चा आएगा तो उसका मन अपने आप लग जायेगा।यह 9 महींने कुमकुम और नीरज पर बहुत भारी गुजर रहे थे।दोनो बस बच्चे के पैदा होने का इंतजार कर रहे थे।कुमकुम को एक बेटा हुआ।उधर रीमा के लिए भी रिश्ते आने लगे।एक रिश्ता बहुत अच्छा आया और कुमकुम की सास उस रिश्ते को छोड़ना नहीं चाहती थी।इसलिए चट मंगनी पट ब्याह हो गया।कुमकुम ने छोटे बच्चे के साथ सब कुछ बहुत अच्छे से संभाला।नीरज तो बस वीकेंड पर ही आ पाता था।सभी कुछ कुमकुम और रीमा ने ही मिलकर मैनेज किया।सभी मेहमानो ने और लड़के वालों ने सारे इंतजाम की बहुत तारीफ की।रीमा के ससुराल जाने के कुछ दिन बाद ही कुमकुम ने अपनी सास से वापस दिल्ली जाने की बात कही और उन्हें भी साथ चलने को कहा।कुमकुम की सास दिल्ली चलने को तैयार भी हो गयी।अब नीरज और कुमकुम के साथ उसकी सास भी रहने लगी।कुमकुम का अपने बच्चे के साथ बहुत दिल लगने लगा।उसने बच्चे की देखभाल और जॉब में से बच्चे की देखभाल को प्राथमिकता दी।धीरे धीरे 3 साल निकल गए और कुमकुम का बेटा स्कूल जाने लगा।अब कुमकुम को फिर से खालीपन काटने को दौड़ता और वह फिर से बुझी बुझी और उदास रहने लगी।चिड़चिड़ी भी हो गयी।कुमकुम की सास और नीरज दोनो कुमकुम की परेशानी समझते थे।उन्होंने कुमकुम को घर पर ही रहकर ऑनलाइन काम या कोचिंग पढ़ाने का सुझाव भी दिया।चूंकि कुमकुम सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी इसलिए उसे कंप्यूटर संबंधित कार्यों में ही रुचि थी।नीरज के एक दोस्त का दिल्ली में ही कंप्यूटर इंस्टिट्यूट था।नीरज ने अपने दोस्त से बात की,सारी जानकारी ली और उसी के इंस्टिट्यूट में कुमकुम को बतौर प्रशिक्षक लगवा दिया।अब जितने समय बेटा स्कूल जाता उतने समय कुमकुम वहां इंस्टिट्यूट में कंप्यूटर का प्रशिक्षण देती।नीरज और उसकी माँ कुमकुम के पीछे से सुबह का सारा काम संभाल लेते।इंस्टिट्यूट से आते हुए कुमकुम अपने बेटे को स्कूल से लेती हुई आ जाती।इस तरह कुमकुम को अपनी पसंद का काम भी मिल गया और उसका मन भी लग गया।एक दिन नीरज ने कुमकुम से पूछा "अब तो तुम खुश हो ना" कुमकुम ने जब उसी सवाल के बदले नीरज से पलटवार सवाल किया खुश तो हूँ लेकिन तुम्हें कैसे पता लगा कि मुझे क्या परेशानी थी?नीरज ने जो जवाब दिया उसे सुनकर कुमकुम की नज़रों में अपनी सास का मान और भी बढ़ गया।"पगली,माँ ने मुझे सभी कुछ बताया और मुझे अपने दोस्त से बात करने को भी कहा।जब मैंने कहा कि कुमकुम के जाने के बाद घर कौन देखेगा तो उन्होंने सुबह के काम की सारी जिम्मेदारी खुद पर ले ली और मुझे यह भी बताया कि तुम रीमा से भी बढ़कर उन का ख्याल रखती हो इसलिए तुम्हें खुश रखना उनका भी फ़र्ज़ है।उन्हें यह भी पता है कि तुम करियर ओरिएंटेड लड़की हो।तुमने सिर्फ हमारे बेटे की वजह से अपनी जॉब छोड़ी।माँ और मेरे लिए पहले तुम्हारी खुशी मायने रखती है।तुम खुश रहोगी तभी तो हमारे बेटे का,माँ का,मेरा,अपना ख्याल ठीक से रख पाओगी।हमारे बेटे को एक अच्छी परवरिश दे पाओगी।कुमकुम के चेहरे पर अनायास ही एक मुस्कान आ गयी।मुस्कान देखकर नीरज भी बोल पड़ाआप सभी को मेरा यह ब्लॉग कैसा लगा कृपया अपने विचार जरूर व्यक्त करें।धन्यवाद!गुंजन

क्यों ना फिर से जी ली जाए जिंदगी
 Gunjan Gera  
 14 July 2018  
Art

मिसेज शर्मा आजकल बहुत खुश रहती हैं क्योंकि उन्होंने डान्स क्लासेस जॉइन कर ली हैं और वह वहां बच्चों को डान्स सिखाने भी लगी हैं।मिसेज शर्मा को डान्स का शौक शुरू से था।थोड़ा थोड़ा करती भी थी लेकिन पिता ने कभी डान्स क्लासेस नहीं जाने दिया।पति खुले विचारों के मिले लेकिन घर गृहस्थी अयर संयुक्त परिवार की जिम्मेदारी में ऐसी फंसी कि अपने लिए वक्त ही निकाल पायी।अब बच्चे अपनी अपनी दुनिया में व्यस्त हो गए हैं तो खुद के लिए वक्त ही वक्त है।60 की उम्र में डान्स क्लासेस जॉइन करने का निर्णय लेना आसान नहीं था लेकिन पति और बच्चों ने साथ दिया और कहा अब मौका है तो जिंदगी जी लो अपनी।अपने शौक पूरे कर लो।स्वाति जी ने 50 की उम्र पार कर अपनी नई नवेली बहु को अपनी साथी बनाकर अपने कार सीखने के शौक को पूरा किया।दोनो सास बहु ने साथ साथ ही कार ड्राइविंग स्कूल जॉइन किया और साथ साथ कार चलाना सीखा।रचना आजकल हारमोनियम और तबला बजाना सीख रही है उसने आजकल यह नया शौक बनाया है।दिन का तीन घंटे वह ऐसे ही अपनी रुचियों को देती है और जब एक शौक से मन भर जाता है तो दूसरे शौक बना लेती है।दोस्तों यह तो कुछ ही उदाहरण हैं।जिनके जरिये मैं आज आपको यह बताना चाहती हूँ कि हमें चाहे हमारी कितनी भी उम्र हो जाए अपने शौक अपने अंदर जिंदा रखने चाहिए और उन्हें पूरा भी करना चाहिए।सीखने की चाहत को कभी खत्म नहीं करना चाहिए।हो सकता है किसी कारणवश आप अपने शौक पूरे नहीं कर पाये तो क्या हुआ,अभी भी देर नहीं हुई है चलिए उठिए और अपनी रुचि,अपने शौक को वक्त देकर मन की सच्ची खुशी महसूस कीजिए।और अगर आप सभी को मेरा यह ब्लॉग अच्छा लगा तो कृपया कमेंट जरूर कीजिए ताकि मैं भविष्य में भी आप सभी के सामने इसी तरह अच्छे अच्छे ब्लॉग लिखकर प्रस्तुत करूं।धन्यवाद!गुंजन

सपना शिक्षा का
 Jaswant Lal Khatik  
 14 July 2018  
Art

रचना - 79✍ ..शिक्षा- का सपना ..✍"""""""""""""""""""""""""""""""""'''''''''''''''''''''कवि जसवंत लाल खटीक💐रतना का गुड़ा ,देवगढ़💐काव्य गोष्ठी मंच, राजसमन्दगाँव धनोली माल , पंचायत - पनोतिया , तहसील - आमेट जिला - राजसमंद में विद्यालय नही होने से बच्चे शिक्षा से वंचित है । SURAT DONATE CLOTHES ORGANIZATION ( SDCO ) संस्था के संस्थापक श्री रमेश जी चौहान साहब का हार्दिक आभार कि आपने सरकार को इस गाँव से और गाँव की पीड़ा से अवगत कराया । आशा है जल्द ही विद्यालय खुलेगा और घर घर में ज्ञान का दीपक जलेगा ।गाँव के बच्चों का सपना - शिक्षा कापेश है मेरी छोटी सी रचनामाँ मुझको भी पढ़ना है ,शिक्षित मुझको बनना है ।कब तक यूँ मजदूरी करेंगे ,अफसर मुझको बनना है ।।देखो , दूसरे गाँव के बच्चें ,हंसते खेलते स्कूल जाते ।मैं भी तो पढ़ना चाहता हूँ ,मुझको भी तो सपने आते ।।कंधे पर बस्ता लटकाकर ,विद्यालय पढ़ने जाऊंगा ।मेहनत करके पढ़ लिखकर ,जीवन सफल बनाऊंगा ।।शिक्षा जब मिलेगी मुझको ,ज्ञान का दीप जलाऊंगा ।माँ बापू के आँख का तारा ,अफसर में कहलाऊंगा ।।सपने सबके पूरे करूँगा ,बहन के गुड़िया लाऊंगा ।बहना को भी पढ़ा लिखाकर ,धूमधाम से शादी कराऊंगा ।।ईमानदारी से पैसे कमाकर ,सब कर्ज़ में चुकाऊंगा ।माँ बापू का सहारा बनकर ,दुःख-दर्द में मिटाऊंगा ।।शिक्षा का मन्दिर बनवा दो ,हम सबको भी ज्ञान दिला दो ।हे सरकार! सुन पुकार हमारी ,अज्ञानता को जड़ से मिटा दो ।।"जसवंत" कहे हे ! सरकार  ,इन बच्चों को भी रस्ता दो ।गाँव में स्कूल बनवाकर ,इनको विद्या का बस्ता दो ।।

एक ग़ज़ल
 Yusuf Rais  
 26 July 2018  
Art

ग़ज़ल/ यूसुफ़ रईसये जो मंज़र है कहाँ था पहलेचार सू मेरे  धुआँ था पहले।उसने मिट्टी को उड़ा कर बोला ये जो इंसाँ है यहाँ था पहले।तुम जिसे दरिया कहा करते होमेरी आंखों में रवां था पहले।ख़ुल्द की आप तमन्ना कीजै मैं तो मौजूद वहाँ था पहले।दरमियां जब न कोई मज़हब थाये जहाँ और जहाँ था पहलेतुमने तामीर किया अपना ख़ुदावरना कब उसका निशां था पहले ।उसके चेहरे की इबारत पढ़ करलौट आया मैं जहाँ था पहले।तेरी सोहबत में ग़ज़ल कहने लगाये हुनर  मुझमें  कहाँ था पहले ।~~~~~~~~~~~~~~~~नाम- यूसुफ़ रईस विधा- कविता/ग़ज़ल/लघु कथा/उपन्यास प्रकाशित कृतियाँ- दो ग़ज़ल संग्रह ' इक तन्हा सफ़र ' व ' चेहरा रिश्तों का' एक बहुचर्चित उपन्यास ' मैं शबाना '। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाओं का प्रकाशन ।शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास ' ओ रे हरिया ' व ' मुजफ़्फ़र नगर ।पता- वार्ड नं. 2 , नयापुरा,पिड़ावा,जिला झालावाड़ राजस्थान,पिन -326034मोबाइल नम्बर-9829595160Email- yusufrais025@gmail.com

साहित्य की सामाजिक भूमिका
 Smt Manorama jain Paakhi  
 26 July 2018  
Art

संगम नारी मंच के समक्षसाहित्य की भूमिका जानने से पूर्व जानते हैंकि साहित्य  क्या है?क्यों हैं? साहित्य नाम क्यों दिया गया?वस्तुतः किसी भी भाषा के वाचिक और लिखित रुप से प्राप्त सँस्कृति,संस्कार,कला को साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है।वाचिक यानि बोलकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तकग्रहण किया गया।लोक गीत ,लोक कलायें ,परंपरायें इसी तरह हस्ताँतरित होती रही हैं।इस हिसाब से देखा जाये तो आदिवासी भाषाओं,कला आदि का साहित्य सबसे प्राचीन है जिसे फरिभाषित करना थोड़ा कठिन है।जिस प्रकार पानी को परिभाषित करना या हवा को परिभाषित करना ,भावना को परिभाषित करना..।आशय हुआ कि शब्दों में हम  जिसे ढालना चाहे जिस रुप में ढालना चाहे जिस आकार में ढालना चाहे ढाल लेते हैं।पर शब्द के साथ जब उसका अर्थ ,उसका भाव भी सामंजस्य रुप में जुड़ा हो तब वह साहित्य की संज्ञा को प्राप्त हो सकता है।ज्ञातव्य है कि संस्कृत के आचार्य  विश्वनाथ महापात्र  सर्वप्रथम साहित्य दर्पण लिख कर साहित्य शब्द को व्यवहार में लाये थे ।वहीं संस्कृत के ही एक अन्य आचार्य कुंतक जी कहते हैं कि -शब्द और अर्थ के लिये सुंदरता की होड़ लगी हो ,स्पर्धा हो वहाँ साहित्य की सृष्टि होती है।क्लिष्ट शब्द ,तुकबंदी,रचना जो भाव हीन हो लेकिन छंद या मीटर के अनुभावों पर शतप्रतिशत सही बैठती हो ठीक वैसी ही है जैसे अपराह्न में जुगनू।इसका आशय ये हुआ कि भाव ही किसी सृजन को वह गहरायी प्रदान करते हैं जो रचना को साहित्य की परिधि में लाते हैं।निदा फ़ाजली ,गाल़िब ,दाग आदि अनेक कवियों ने बहुत ही सहज ,सरल शब्दों में गहरे भावों की रचना की जिसे रोम रोम महसूस कर सका यही साहित्य है।दुष्यंत कुमार ,जयशंकर प्रसाद रामधारी सिंह दिनकर आदि की रचनायें गहरे भावों को संजोती रचनायें हैं।अर्थात् साहित्य -शब्द ,अर्थ और भावों की त्रिवेणी हैं जो जनहित की धारा के साथ उच्चादर्शों की दिशा में सामाजिक सरोकारों को साथ ले प्रवाहित है।यही है उद्देश्य भी अर्थात् वाचिक,मौलिक ,लिखित रुप से सामाजिक सरोकारों के साथ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्ताँतरित ,हितकारी,संस्कार ,संस्कृति ही साहित्य है।तो अपने भाव सौंदर्य के साथ शब्द अर्थ की विस्तृत व्याख्या करता है।उद्देश्य या भूमिका---एक वाक्य में कहा जाये तो प्राचीन परंपरा को सहेजना,समझना साहित्य का उद्देश्य हो सकता है।लेकिन मूलरुप से कुरीतियाँ मिटाकर सामाजिक बुराइयों से अलग स्वस्थ ,सुंदर, सामाजिकता की परंपरा ही साहित्य का उद्देश्य है।सा-सहित,हित्-हितकारी,य-यत्न पूर्वक।यानि समाज के लिये हितकारी यत्नपूर्वक हित सहित जो मानव ,समाज के लिये जीवन को सहज ,सरल बनाये वही कला साहित्य का उद्देएश्य है।साहित्य में मानव जीवन के सद्विचार ,भाव निहित होते हैं।ऐसे भाव जिनका उद्देश्य जीवन,समाज में व्याप्त कुरुपताओ,रुढ़ियों,दुष्प्रभावों विसंगतियों को को मिटाना है।केवल रस या आनंद प्राप्ति अथवा मनोरंजन मात्र ही साहित्य का उद्देश्य नहीं है।स्वस्थ मन ,दिमाग वाला व्यक्ति हर जगह सौंदर्य और रस खोज लेता है।साहित्य का उद्देश्य है कि वह  समाज की रूढ़ियों,विसंगतियों को नीति उपदेश के साथ  मित्र ,प्रिय के समान मिष्ट बातों द्वारा कलात्मक,सहज,सरल भावपूर्ण शब्दों में बताये और परिवर्तन के लिये प्रेरित करे।इसी लिये साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है।जहाँ समाज में उपजी कलुषता ,विसंगतियों,,अपराधों को इंगित कर उनका निराकरण किया जाता है।एक दिशाबोध दिया जाता है।यही साहित्य का उद्देश्य है। फिर चाहे वह आलोचना हो, व्याख्या हो कथा हो काव्य हो हर धारा दर्पणवत् समाज का चेहरा सामने लाता है।साहित्य मनोरंजन के साथ कल्याण और निर्माण की भावना को भी साथ लेकर चलता है।फ्रांस की क्रांति,रुस की क्रांति,भारत की क्रांति ..सभी के मूल में साहित्य  का प्रभाव था। जब भी जहाँ भी कुछ क्रांतिकारी परिवर्तन हुये ,साहित्य ही सहयोगी रहा।जीवन की सड़ी गली परंपराओं,रुढ़ियों,हीनताओं से जीवन को निकालना ही साहित्य का उद्देश्य हमेशा से रहा है।अर्थात्  मनोरंजक तरीके से मानव समाज के हितार्थ ,शुभकारी,लौकिक पारलौकिक मुक्ति ,साहित्य का चरम  उद्देश्य कहा जा सकता है।जो जीवन को प्रभावित करने वाले व्यवहारिक सत्य हैं उन्हें रोचक ढंग से अभिव्यक्त करना और मानव या व्यक्ति अथवा पाठक को उस से परिचित करा के परिवर्तन करना ही साहित्य का उद्देश्य है ।

मंगलसूत्र
 Sandeep Gupta  
 9 August 2018  
Art

मैंने नई नौकरी पकड़ी। सोचा रवि की थोड़ी मदद कर दूँ। रवि मेरा पति, उसने भी मेरी बात समझी और हामी भर दी। पहला दिन नौकरी का। रवि ने बोला थोड़ा ठीक से तैयार होकर जाना तुम आफिस, मंगलसूत्र भी निकाल जाना। मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने मंगलसूत्र उतारा नहीं पर ऐसे पहना कि दिखाई नहीं दे। सिन्दूर भी थोड़ा लगाया। मुझे नौकरी मिली थी पर्सनल असिस्टेंट की। मुझे एक हफ्ता हुआ नौकरी करते हुए। एक दिन बाॅस मुझे अपने साथ किसी पार्टी में ले गए। पार्टी थी बड़े लोगों की। मन नहीं था फिर भी मना नहीं कर पाई, नई नौकरी जो थी। बाॅस के साथ उस दिन कई सवाल का सामना करना पड़ा। कई प्रस्ताव भी थे। मेरा जवाब देना जरूरी हो गया था। मेरा मंगलसूत्र सामने आ गया था और पार्टी छोड़ मैं घर के लिए निकल गई। दुसरे दिन मैंने मंगलसूत्र को छूपाया नहीं। मेरी और पहचान के साथ, एक और पहचान मेरी.... मेरा मंगलसूत्र।