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बात है 90 के दशक की श्रीलंका में एक खिलाड़ी ने राष्ट्रीय खेलो में बेहतरीन प्रदर्शन किया और श्रीलंका की राष्ट्रीय टीम में अपनी जगह बनाई। राष्ट्रीय खेल और अंतर्राष्ट्रीय खेल में थोड़ा सा अंतर तो होता है मगर इतना भी नही की सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करने वाला खिलाड़ी असफल हो जाये। लेकिन कभी कभी ऐसा हो जाता है। वह खिलाड़ी असफल हो गया और राष्ट्रीय टीम से उसे निकाल दिया गया। उस खिलाड़ी ने अपनी कमियों की तरफ ध्यान दिया और लगन के साथ फिर मेहनत करने लगा। इस बार फिर उसने राष्ट्रीय स्तर के खेलों में बेहतरीन प्रदर्शन किया और अपने देश के लिए खेलने के लिए टीम में चुना गया।लेकिन दुर्भाग्य भी उसके साथ था। वह इस बार भी असफल रहा और टीम से निकाल दिया गया। बहुत से लोग पहली या दूसरी बार में हार मान जाते है। लेकिन यह किसी और मिट्टी का बना था। इस बार फिर इसने मेहनत की और फिर से अपने देश के लिए खेलने के लिए चुना गया। इस बार दुर्भाग्य उसको छोड़ कर जा चुका था। उसने अब अंतराष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बनाई और अपने देश की टीम का कप्तान भी बना। उस खिलाड़ी का नाम है मर्विन अटापट्टू।
कुछ ऐसा ही वाक्या भारत के सफलतम कप्तानों में से एक सौरव गांगुली के साथ भी हुआ था। उन्हें भी जब अंतराष्ट्रीय स्तर पर खेलने का मौका मिला तो वे असफ़ल हो गए थे और टीम से निकाल दिए गए थे। फिर से उन्होंने मेहनत की और सफलता की सीढ़ियों को छुआ।
एक बार मुम्बई में अंडर 15 मैच होना था भारत की तरफ से एक खिलाड़ी जिसकी उम्र महज 8 वर्ष की थी टीम में था। कोच ने उस खिलाड़ी को सलामी बल्लेबाजी के लिए भेजा। सामने पंद्रह वर्षीय घातक गेंदबाज गेंदबाजी कर रहा था। गेंदबाज ने गेंद फेंकी और गेंद आकर बल्लेबाज के हेलमेट पर लगी और वह गिर पड़ा जोर जोर से रोने लगा। कोच दौड़ता हुआ मैदान में आया और उसे अपने निर्णय पर अफसोस होने लगा कि एक बच्चे को ऐसे गेंदबाज के सामने सलामी बल्लेबाजी के लिए नही भेजना चाहिए था। उसने उस बच्चे को कहा कि तुम अभी बल्लेबाजी छोड़ कर चलो, तुम्हारी जगह दूसरा बल्लेबाज आ जाएगा। लेकिन उस बच्चे ने जवाब दिया नहीं मैं खेलूंगा और तुरंत उठ के खड़ा हो गया। कोच के बार बार मना करने के बाद भी वह नही माना और डटा रहा। कोच ने फिर उसे खेलने के लिए हाँ कर दी। वह बच्चा क्रीज पर फिर से खड़ा था गेंदबाज फिर से तैयार हुआ। गेंदबाज दौड़ता हुआ आया और तेज़ गति से उसने गेंद फेंकी । बच्चे ने बल्ला घुमाया और गेंद सीमा रेखा के बाहर चार रनों के लिए चली गयी। उसके बाद कि अगली 4 गेंद का भी वही हस्र हुआ। उस बल्लेबाज का नाम अजिंक्या रहाणे है। जिसने बाद में भारतीय टीम में अपनी अलग पहचान बनाई।

कुछ ऐसा ही हमारे साथ जिंदगी में होता रहता है। कभी हमारी मेहनत से हमें जो स्थान चाहिए होता है वह नही मिल पाता है तो हमे सौरव गांगुली और अटापट्टू की तरह प्रयास करते रहने चाहिए। कभी हम ठोकर खा कर गिरते है और डर कर प्रयास छोड़ देते है। उस जगह हमें रहाणे की तरह निडर होकर परिस्थितियों का सामना करना चाहिए।