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एक नहीं दिन हज़ार है जिए, हे औरत तेरी रौशनी में जलाई है कितने दिए
तेरी ममता की छाओ में पालकर, कितनी ही बलिष्ठो का निर्माण हुआ
कितने तेरे प्रेम के आंगन में चहककर, दुनिया को ललकारते है फिरे

कभी माँ बन जाती है तू, कभी बहन बनके सहलाती है मुझे
कभी बेटी बन, किलकारी मार सबको रिझाती है तू
भार्या बन,मकान को घर बनती है तू
तो कभी नानी दादी का स्वांग रचकर, कहानिया सुनती है तू

तू सब बन जाती है सबके खातिर, पर तू तू नहीं रह जाती
वक़्त के पहिये में उलझ,
सबको रास्ता दिखाते दिखाते
खुद कहीं भटक जाती है तू

एक दिन नहीं, सारी जिंदगी न्योछावर उस नारी पे
जिसके आधे अंश से बने हम,
आधे वरना रहजाते
इस  गहरे, निरक्षर वन में